एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते। ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः ॥ १ ॥
arjuna uvāca—
evaṃ satatayuktā ye bhaktāstvāṃ paryupāsate. ye cāpyakṣaramavyaktaṃ teṣāṃ ke yogavittamāḥ .. 1 ..
‘एवम्’ शब्दसे जिसके आदिमें ‘मत्कर्मकृत्’ यह पद है, उस पासमें ही कहे हुए श्लोकके अर्थका अर्थात् एकादश अध्यायके अन्तिम श्लोकमें कहे हुए अर्थका (अर्जुन) निर्देश करता है।
इस प्रकार निरन्तरतासे उपर्युक्त साधनोंमें अर्थात् भगवदर्थ कर्म करने आदिमें दत्तचित्त हुए—लगे हुए जो भक्त, अनन्य भावसे शरण होकर पूर्वदर्शित विश्वरूपधारी आप परमेश्वरकी उपासना करते हैं—उसीका ध्यान किया करते हैं।
तथा दूसरे जो समस्त वासनाओंका त्याग करनेवाले, सर्व-कर्म-संन्यासी (ज्ञानीजन) उपर्युक्त विशेषणोंसे युक्त परम अक्षर, जो समस्त उपाधियोंसे रहित होनेके कारण अव्यक्त है, ऐसे इन्द्रियादि करणोंसे अतीत ब्रह्मकी उपासना किया करते हैं। संसारमें जो इन्द्रियादि करणोंसे जाननेमें आनेवाला पदार्थ है वह व्यक्त कहा जाता है; क्योंकि ‘अञ्जेः’ धातुका अर्थ इन्द्रियगोचर होना ही है और यह अक्षर उससे विपरीत अकरणगोचर हैं एवं महापुरुषोंद्वारा कहे हुए विशेषणोंसे युक्त हैं, ऐसे ब्रह्मकी जो उपासना करते हैं।
उन दोनोंमें श्रेष्ठतर योगवेत्ता कौन हैं ? अर्थात् अधिकतासे योग जाननेवाले कौन हैं ? ॥ १ ॥
श्रीभगवान् बोले—
जो कामनाओंसे रहित पूर्णज्ञानी अक्षरब्रह्मके उपासक हैं उनको अभी रहने दो, उनके प्रति जो कुछ कहना है वह आगे कहेंगे, परंतु जो दूसरे हैं—
तात्पर्य पढ़ें
एवम् इति अतीतानन्तरश्लोके उक्तम् अर्थः
परामृशति, ‘मत्कर्मकृत्’ इत्यादिना ।
एवं सततयुक्ता नैरन्तर्येण भगवत्कर्मादौ यथोक्ते अर्थे समाहिताः सन्तः प्रवृत्ता इत्यर्थः । ये भक्ता अनन्यशरणाः सन्तः त्वां यथादर्शितं विश्वरूपं पर्युपासते ध्यायन्ति ।
ये च अन्ये अपि त्यक्तसर्वैषणाः सन्न्यस्त-सर्वकर्माणो यथाविशेषितं ब्रह्म अक्षरं निरस्त-सर्वोपाधित्वाद् अव्यक्तम् अकरणगोचरम् । यद् हि लोके करणगोचरं तद् व्यक्तम् उच्यते अञ्जेः धातोः तत्कर्मकत्वाद् इदं तु अक्षरं तद्विपरीतम्, शिष्टैः च उच्यमानैः विशेषणैः विशिष्टं तद् ये च अपि पर्युपासते ।
तेषाम् उभयेषां मध्ये के योगवित्तमाः के अतिशयेन योगविद इत्यर्थः ॥ १ ॥
श्रीभगवानुवाच—
ये तु अक्षरोपासकाः सम्यग्दर्शिनो निवृत्तैषणाः ते तावत् तिष्ठन्तु तान् प्रति यद् वक्तव्यं तद् उपरिष्टाद् वक्ष्यामः। ये तु इतरे—