निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी ॥ १३ ॥
adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca .
nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī .. 13 ..
जो सब भूतों में द्वेषभाव से रहित है अर्थात् अपने लिये दुःख देनेवाले भी किसी प्राणी से द्वेष नहीं करता, समस्त भूतों को आत्मारूप से ही देखता है।
तथा जो मित्रता से युक्त है अर्थात् सबके साथ मित्रभाव से बर्तता है और करुणामय है—दीन-दुःखियों पर दया करना करुणा है, उससे युक्त है, अभिप्राय यह कि जो सब भूतों को अभय देनेवाला संन्यासी है।
तथा जो ममता से रहित और अहंकार से रहित है, एवं सुख-दुःख में सम है अर्थात् सुख और दुःख जिसके अन्तःकरण में राग-द्वेष उत्पन्न नहीं कर सकते।
जो क्षमावान् है अर्थात् किसी के द्वारा गाली दी जाने पर या पीटे जाने पर भी जो विकाररहित ही रहता है ॥ १३ ॥
तात्पर्य पढ़ें
अद्वेष्टा सर्वभूतानां न द्वेष्टा आत्मनो दुःखहेतुम् अपि न किञ्चिद् द्वेष्टि सर्वाणि भूतानि आत्मत्वेन हि पश्यति।
मैत्रो मित्रभावो मैत्री मित्रतया वर्तते इति मैत्रः। करुण एव च करुणा कृपा दुःखितेषु दया तद्वान् करुणः सर्वभूताभयप्रदः सन्न्यासी इत्यर्थः।
निर्ममो ममप्रत्ययवर्जितो निरहङ्कारो निर्गताहम्प्रत्ययः समदुःखसुखः समे दुःखसुखे द्वेषरागयोः अप्रवर्तके यस्य स समदुःखसुखः ।
क्षमी क्षमावान् आक्रुष्टः अभिहतो वा अविक्रिय एव आस्ते ॥ १३ ॥