अध्याय 12 - श्लोक 14

सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः ।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥ १४ ॥

santuṣṭaḥ satataṃ yogī yatātmā dṛḍhaniścayaḥ .
mayyarpitamanobuddhiryo madbhaktaḥ sa me priyaḥ .. 14 ..


तथा जो सदा ही सन्तुष्ट है अर्थात् देह-स्थितिके कारणरूप पदार्थोंकी लाभ-हानिमें जिसके ‘जो कुछ होता है वही ठीक है’ ऐसा ‘अलम्’ भाव हो गया है, इस प्रकार जो गुणयुक्त वस्तुके लाभमें और उसकी हानिमें सदा ही सन्तुष्ट रहता है। तथा जो समाहितचित्त, जीते हुए स्वभाववाला और दृढ़ निश्चयवाला है अर्थात् आत्मतत्त्वके विषयमें जिसका निश्चय स्थिर हो चुका है।

तथा जो मुझमें अर्पण किये हुए मन-बुद्धिवाला है अर्थात् जिस संन्यासीका संकल्प-विकल्पात्मक मन और निश्चयात्मिका बुद्धि ये दोनों मुझमें समर्पित हैं—स्थापित हैं। जो ऐसा मेरा भक्त है वह मेरा प्यारा है।

‘ज्ञानीको मैं अत्यन्त प्यारा हूँ और वह मुझे प्रिय है’ इस प्रकार जो सप्तम अध्यायमें सूचित किया गया था उसीका यहाँ विस्तारपूर्वक वर्णन किया जाता है ॥ १४ ॥

तात्पर्य पढ़ें

सन्तुष्टः सततं नित्यं देहस्थितिकारणस्य लाभे अलाभे च उत्पन्नालम्प्रत्ययः, तथा गुणवल्लाभे विपर्यये च सन्तुष्टः सततम्, योगी समाहितचित्तो यतात्मा संयतस्वभावो दृढ-निश्चयो दृढः स्थिरो निश्चयः अध्यवसायो यस्य आत्मतत्त्वविषये स दृढनिश्चयः ।

मयि अर्पितमनोबुद्धिः सङ्कल्पात्मकं मनः अध्यवसायलक्षणा बुद्धिः ते मयि एव अर्पिते स्थापिते यस्य सन्न्यासिनः स मयि अर्पित-मनोबुद्धिः । य ईदृशो मद्भक्तः स मे प्रियः ।

‘प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः’ इति सप्तमेऽध्याये सूचितं तद् इह प्रपञ्च्यते ॥ १४ ॥