सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्धक्तः स मे प्रियः ॥ १६ ॥
anapekṣaḥ śucirdakṣa udāsīno gatavyathaḥ .
sarvārambhaparityāgī yo maddhaktaḥ sa me priyaḥ .. 16 ..
जो शरीर, इन्द्रिय, विषय और उनके सम्बन्ध आदि स्पृहा के विषयों में अपेक्षारहित—नि:स्पृह है, बाहर-भीतर की शुद्धि से सम्पन्न है, और चतुर अर्थात् अनेक कर्तव्यों के प्राप्त होने पर उनमें से तुरंत ही यथार्थ कर्तव्य को निश्चित करने में समर्थ है।
तथा जो उदासीन अर्थात् किसी मित्र आदि का पक्षपात न करनेवाला संन्यासी है और गतव्यथ यानी निर्भय है।
तथा जो समस्त आरम्भों का त्याग करनेवाला है—जो आरम्भ किये जायँ उनका नाम आरम्भ है, इसके अनुसार इस लोक और परलोक के फलभोग के लिये किये जानेवाले समस्त कामना हेतुक कर्मों का नाम सर्वारम्भ है, उन्हें त्यागने का जिसका स्वभाव है ऐसा जो मेरा भक्त है वह मेरा प्यारा है ॥ १६ ॥
तथा—
तात्पर्य पढ़ें
देहेन्द्रियविषयसम्बन्धादिषु अपेक्षाविषयेषु अनपेक्षो निःस्पृहः, शुचिः बाह्येन आभ्यन्तरेण च शौचेन सम्पन्नः, दक्षः प्रत्युत्पन्नेषु कार्येषु सद्यो यथावत् प्रतिपत्तुं समर्थः।
उदासीनो न कस्यचिद् मित्रादेः पक्षं भजते
यः स उदासीनो यतिः, गतव्यथो गतभयः।
सर्वारम्भपरित्यागी, आरभ्यन्ते इति आरम्भा इहामुत्रफलभोगार्थानि कामहेतूनि कर्माणि सर्वारम्भाः तान् परित्यक्तं शीलम् अस्य इति सर्वारम्भपरित्यागी, यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥ १६ ॥