तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित् ।
अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ॥ १९ ॥
kiṃ ca—
tulyanindāstutirmaunī santuṣṭo yena kenacit .
aniketaḥ sthiramatirbhaktimānme priyo naraḥ .. 19 ..
जिसके लिये निन्दा और स्तुति दोनों बराबर हो गयी हैं, जो मुनि संयतवाक् है अर्थात् वाणी जिसके वश में है तथा जो जिस किसी प्रकार से भी शरीरस्थितिमात्र से सन्तुष्ट है।
कहा भी है कि ‘जो जिस किसी (अन्य) मनुष्य द्वारा ही वस्त्रादि से ढका जाता है, एवं जिस किसी (दूसरे)-के द्वारा ही जिसको भोजन कराया जाता है और जो जहाँ कहीं भी सोनेवाला होता है उसको देवता लोग ब्राह्मण समझते हैं।’
तथा जो स्थान से रहित है अर्थात् जिसका कोई नियत निवासस्थान नहीं है, अन्य स्मृतियों में भी ‘अनागारः’ इत्यादि वचनों से यही कहा है, तथा जो स्थिरबुद्धि है—जिसकी परमार्थविषयक बुद्धि स्थिर हो चुकी है, ऐसा भक्तिमान् पुरुष मेरा प्यारा है ॥ १९ ॥
समस्त तृष्णा से निवृत्त हुए, परमार्थज्ञाननिष्ठ अक्षरोपासक संन्यासियों के ‘अद्वेष्टा सर्वभूतानाम्’ इस श्लोक द्वारा प्रारम्भ किये हुए धर्मसमूह का उपसंहार किया जाता है—
तात्पर्य पढ़ें
तुल्यनिन्दास्तुतिः निन्दा च स्तुतिः च निन्दास्तुती ते तुल्ये यस्य स तुल्यनिन्दास्तुतिः, मौनी मौनवान् संयतवाक्, सन्तुष्टो येन केनचित् शरीरस्थितिमात्रेण।
तथा च उक्तम्—
‘येन केनचिदाच्छन्नो येन केनचिदाशितः।
यत्र क्वचनशायी स्यात्तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥’ (महा० शान्ति० २४५। १२) इति।
किं च अनिकेतो निकेत आश्रयो निवासो नियतो न विद्यते यस्य सः अनिकेतः ‘अनागारः’ इत्यादिस्मृत्यन्तरात् । स्थिरमतिः स्थिरा परमार्थवस्तुविषया मतिः यस्य स स्थिरमतिः भक्तिमान् मे प्रियो नरः ॥ १९ ॥
‘अद्वेष्टा सर्वभूतानाम्’ इत्यादिना अक्षरस्य उपासकानां निवृत्तसर्वैषणानां सन्न्यासिनां परमार्थज्ञाननिष्ठानां धर्मजातं प्रक्रान्तम् उपसंह्रियते—