श्रद्धधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः ॥ २० ॥
ye tū dharmyāmṛtamidaṃ yathoktaṃ paryūpāsate.
śraddhadhānā matparamā bhaktāste’tīva me priyāḥ .. 20 ..
जो संन्यासी इस धर्ममय अमृत को अर्थात् जो धर्म से ओतप्रोत है और अमृतत्व का हेतु होने से अमृत भी है, ऐसे इस ‘अद्वेष्टा सर्वभूतानाम्’ इत्यादि श्लोकों द्वारा ऊपर कहे हुए (उपदेश)-का श्रद्धालु होकर सेवन करते हैं—उसका अनुष्ठान करते हैं, वे मेरे परायण अर्थात् ‘मैं अक्षरस्वरूप परमात्मा ही जिनकी निरतिशय गति हूँ’ ऐसे, यथार्थ ज्ञानरूप उत्तम भक्ति का अवलम्बन करनेवाले मेरे भक्त, मुझे अत्यन्त प्रिय हैं।
‘प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थम्’ इस प्रकार जो विषय सूत्ररूप से कहा गया था यहाँ उसकी व्याख्या करके ‘भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः’ इस वचन से उसका उपसंहार किया गया है।
कहने का अभिप्राय यह है कि इस यथोक्त धर्मयुक्त अमृतरूप उपदेश का अनुष्ठान करनेवाला मनुष्य मुझ साक्षात् परमेश्वर विष्णु भगवान् का अत्यन्त प्रिय हो जाता है, इसलिये विष्णु के प्यारे परमधाम को प्राप्त करने की इच्छावाले मुमुक्षु पुरुष को इस धर्मयुक्त अमृत का यत्नपूर्वक अनुष्ठान करना चाहिये ॥ २० ॥
सातवें अध्याय में ईश्वर की दो प्रकृतियाँ बतलायी गयी हैं—पहली आठ प्रकार से विभक्त त्रिगुणात्मिका प्रकृति जो संसार का कारण होने से ‘अपरा’ है। और दूसरी ‘परा’ प्रकृति जो कि जीवभूत, क्षेत्रज्ञरूपा, ईश्वरात्मिका है।
जिन दोनों प्रकृतियों से युक्त हुआ ईश्वर जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय का कारण होता है, उन क्षेत्र और क्षेत्रज्ञरूप दोनों प्रकृतियों के निरूपण द्वारा उन प्रकृतियोंवाले ईश्वर का तत्त्व निश्चित करने के लिये यह ‘क्षेत्रविषयक’ अध्याय आरम्भ किया जाता है।
इसके पहले बारहवें अध्याय में ‘अद्वेष्टा सर्व-भूतानाम्’ से लेकर अध्याय की समाप्ति पर्यन्त तत्त्वज्ञानी संन्यासियों की निष्ठा अर्थात् वे जिस प्रकार बर्ताव करते हैं, सो कहा गया। उपर्युक्त धर्म का आचरण करने से फिर वे कौन-से तत्त्व-ज्ञान से युक्त होकर भगवान् के प्यारे हो जाते हैं, इस आशय को समझाने के लिये भी यह तेरहवाँ अध्याय आरम्भ किया जाता है।
समस्त कार्य, करण और विषयों के आकार में परिणत हुई त्रिगुणात्मिका प्रकृति पुरुष के लिये भोग और अपवर्ग का सम्पादन करने के निमित्त देह-इन्द्रियादि के आकार से संहत (मूर्तिमान्) होती है, वह संघात ही यह शरीर है, उसका वर्णन करने के लिये श्रीभगवान् बोले—
तात्पर्य पढ़ें
ये तु सन्न्यासिनो धर्म्यामृतं धर्माद् अनपेतं धर्म्यं च तद् अमृतं च तद् अमृतत्वहेतुत्वाद् इदं यथोक्तम् ‘अद्वेष्टा सर्वभूतानाम्’ इत्यादिना पर्युपासते अनुतिष्ठन्ति श्रद्धानाः सन्तः मत्परमा यथोक्तः अहम् अक्षरात्मा परमो निरतिशय गतिः येषां ते मत्परमा मद् भक्ताः च उत्तमां परमार्थज्ञानलक्षणां भक्तिम् आश्रिताः ते अतीव मे प्रियाः ।
‘प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थम्’ इति यत् सूचितं तद् व्याख्याय इह उपसंहृतं भक्ताः ते अतीव मे प्रिया इति।
यस्माद् धर्म्यामृतम् इदं यथोक्तम् अनुतिष्ठन् भगवतो विष्णोः परमेश्वरस्य अतीव मे प्रियो भवति तस्माद् इदं धर्म्यामृतं मुमुक्षुणा यत्नतः अनुष्ठेयं विष्णोः प्रियं परं धाम जिगमिषुणा इति वाक्यार्थः ॥ २० ॥
सप्तमे अध्याये सूचिते द्वे प्रकृती ईश्वरस्य। त्रिगुणात्मिका अष्टधा भिन्ना अपरा संसार-हेतुत्वात् परा च अन्या जीवभूता क्षेत्रज्ञ-लक्षणा ईश्वरात्मिका।
याभ्यां प्रकृतिभ्याम् ईश्वरो जगदुत्पत्ति- स्थितिलयहेतुत्वं प्रतिपद्यते। तत्र क्षेत्रक्षेत्रज्ञ- लक्षणप्रकृतिद्वयनिरूपणद्वारेण तद्वद् ईश्वरस्य तत्त्वनिर्धारणार्थं क्षेत्राध्याय आरभ्यते।
अतीतानन्तराध्याये च ‘अद्वेष्टा सर्वभूतानाम्’ इत्यादिना यावद् अध्यायपरिसमाप्तिः तावत् तत्त्वज्ञानिनां सन्न्यासिनां निष्ठा यथा ते वर्तन्ते इति एतद् उक्तम्, केन पुनः ते तत्त्वज्ञानेन युक्ता यथोक्तधर्माचरणाद् भगवतः प्रिया भवन्ति इति एवमर्थः च अयम् अध्याय आरभ्यते।
प्रकृतिः च त्रिगुणात्मिका सर्वकार्यकरण-विषयाकारेण परिणता पुरुषस्य भोगापवर्गार्थ-कर्तव्यतया देहेन्द्रियाद्याकारेण संहन्यते सः अयं सङ्घात इदं शरीरं तद् एतत्—
इति श्रीमहाभारते शतसाहस्त्र्यां संहितायां वैयासिक्यां भीष्मपर्वणि-श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन-संवादे भक्तियोगो नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यश्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ श्रीमद्भगवद्गीताभाष्ये भक्तियोगो नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥