अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ॥ ५ ॥
kleśo’dhikatarasteṣāmavyaktāsaktacetasām
avyaktā hi gatirduḥkhaṃ dehavadbhiravāpyate .. 5 ..
(उनको) क्लेश अधिकतर होता है। यद्यपि मेरे ही लिये कर्मादि करनेमें लगे हुए साधकोंको भी बहुत क्लेश होता है, परंतु जिनका चित्त अव्यक्तमें आसक्त है, उन अक्षरचिन्तक परमार्थदर्शियोंको तो देहाभिमान का परित्याग करना पड़ता है, इसलिये उन्हें और भी अधिक क्लेश उठाना पड़ता है।
क्योंकि जो अक्षरात्मिका अव्यक्तगति है वह देहाभिमानयुक्त पुरुषोंको बड़े कष्ट से प्राप्त होती है, अतः उनको अधिकतर क्लेश होता है। उन अक्षरोपासकोंका जैसा आचार-विचार-व्यवहार होता है वह आगे (‘अद्वेष्टा’ इत्यादि श्लोकोंसे) बतलायेंगे ॥ ५ ॥
तात्पर्य पढ़ें
क्लेशः अधिकतरो यद्यपि मत्कर्मादिपराणां क्लेशः अधिक एव क्लेशः अधिकतरः तु अक्षरात्मनां परमार्थदर्शिनां देहाभिमान-परित्यागनिमित्तः अव्यक्तासक्तचेतसाम् अव्यक्ते आसक्तं चेतो येषां ते अव्यक्तासक्तचेतसः तेषाम् अव्यक्तासक्तचेतसाम् ।
अव्यक्ता हि यस्माद् या गतिः अक्षरात्मिका दुःखं सा देहवद्भिः देहाभिमानवद्भिः अवाप्यते अतः क्लेशः अधिकतरः । अक्षरोपासकानां यद् वर्तनं तद् उपरिष्टाद् वक्ष्यामः ॥ ५ ॥