समुद्धर्ता
भवामि
नचिरात्पार्थ
मृत्युसंसारसागरात् ।
मय्यावेशितचेतसाम् ॥ ७ ॥
teṣāmahaṃ
samuddhartā
bhavāmi
nacirātpārtha
mṛtyusaṃsārasāgarāt .
mayyāveśitacetasām .. 7 ..
हे पार्थ! मुझ विश्वरूप परमेश्वर में ही जिनका चित्त समाहित है ऐसे केवल एक मुझ परमेश्वर की उपासना में ही लगे हुए उन भक्तों का मैं ईश्वर उद्धार करनेवाला होता हूँ। किससे (उनका उद्धार करते हैं)? सो कहते हैं कि मृत्युयुक्त संसार-समुद्र से। मृत्युयुक्त संसार का नाम मृत्युसंसार है, वही पार उतरने में कठिन होने के कारण सागर की भाँति सागर है, उससे मैं उनका विलम्ब से नहीं, किंतु शीघ्र ही उद्धार कर देता हूँ॥ ७॥
जब कि यह बात है तो—
तात्पर्य पढ़ें
तेषां मदुपासनैकपराणाम् अहम् ईश्वरः समुद्धर्ता । कुत इति आह मृत्युसंसारसागरात्, मृत्युयुक्तः संसारो मृत्युसंसारः स एव सागर इव सागरो दुरुत्तरत्वात् तस्माद् मृत्युसंसारसागराद् अहं तेषां समुद्धर्ता भवामि न चिरात् किं तर्हि क्षिप्रम् एव हे पार्थ मयि आवेशितचेतसां मयि विश्वरूपे आवेशितं समाहितं प्रवेशितं चेतो येषां ते मयि आवेशितचेतसः तेषाम् ॥ ७ ॥
यत एवं तस्मात्—