इदं शरीरं कौन्तेय एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः
क्षेत्रमित्यभिधीयते ।
क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ॥ १ ॥
śrībhagavānuvāca—
idaṃ śarīraṃ kaunteya etadyo vetti taṃ prāhuḥ
kṣetramityabhidhīyate .
kṣetrajña iti tadvidaḥ .. 1 ..
‘इदम्’ इस सर्वनामसे कही हुई वस्तुको ‘शरीरम्’ इस विशेषणसे स्पष्ट करते हैं।
हे कुन्तीपुत्र! शरीरको चोट आदिसे बचाया जाता है इसलिये, या यह शनैः-शनैः क्षीण— नष्ट होता रहता है इसलिये, अथवा क्षेत्रके समान इसमें कर्मफल प्राप्त होते हैं इसलिये, यह शरीर ‘क्षेत्र’ है इस प्रकार कहा जाता है। यहाँ ‘इति’ शब्द ‘एवम्’ शब्दके अर्थमें है।
इस शरीररूप क्षेत्रको जो जानता है—चरणोंसे लेकर मस्तकपर्यन्त (इस शरीरको) जो ज्ञानसे प्रत्यक्ष करता है अर्थात् स्वाभाविक या उपदेशद्वारा प्राप्त अनुभवसे विभागपूर्वक स्पष्ट जानता है उस जाननेवालेको ‘क्षेत्रज्ञ’ कहते हैं।
यहाँ भी ‘इति’ शब्द पहलेकी भाँति ‘एवम्’ शब्दके अर्थमें ही है, अत: ‘क्षेत्रज्ञ’ ऐसा कहते हैं। कौन कहते हैं? उनको जाननेवाले अर्थात् उन क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ दोनोंको जो जानते हैं वे ज्ञानी पुरुष (कहते हैं) ॥ १ ॥
इस प्रकार कहे हुए क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ क्या इतने ज्ञानसे ही जाने जा सकते हैं? इसपर कहते हैं कि नहीं—
तात्पर्य पढ़ें
इदम् इति सर्वनाम्ना उक्तं विशिनष्टि शरीरम् इति।
हे कौन्तेय क्षतत्राणात् क्षयात् क्षरणात् क्षत्रवद् वा अस्मिन् कर्मफलनिर्वृत्तेः क्षेत्रम् इति। इति शब्दः
एवंशब्दपदार्थकः क्षेत्रम् इति एवम् अभिधीयते कथ्यते।
एतत् शरीरं क्षेत्रम् यो वेत्ति विजानाति आपादतलमस्तकं ज्ञानेन विषयीकरोति स्वभाविकेन औपदेशिकेन वा वेदनेन विषयी-करोति विभागशः तं वेदितारं प्राहुः कथयन्ति क्षेत्रज्ञ इति।
इतिशब्द एवंशब्दपदार्थक एव पूर्ववत् क्षेत्रज्ञ इति एवम् आहुः। के, तद्विदः तौ क्षेत्रक्षेत्रज्ञौ ये विदन्ति ते तद्विदः ॥ १ ॥
एवं क्षेत्रक्षेत्रज्ञौ उक्तौ किम् एतावन्मात्रेण ज्ञानेन ज्ञातव्यौ इति न इति उच्यते—