अध्याय 13 - श्लोक 10

किं च—
मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी ।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि ॥ १० ॥

kiṃ ca—
mayi cānanyayogena bhaktiravyabhicāriṇī .
viviktadeśasevitvamaratirjanasaṃsadi .. 10 ..


मुझ ईश्वर में अनन्य योग से—एकत्वरूप समाधियोग से अव्यभिचारिणी भक्ति। भगवान् वासुदेव से पर अन्य कोई भी नहीं है, अतः वही हमारी परमगति है, इस प्रकार की जो निश्चित अविचल बुद्धि है वही अनन्य योग है, उससे युक्त होकर भजन करना ही ‘कभी विचलित न होनेवाली अव्यभिचारिणी भक्ति’ है, वह भी ज्ञान है।

विविक्तदेशसेवित्व — एकान्त पवित्रदेश-सेवन का स्वभाव। जो देश स्वभाव से पवित्र हो या झाड़ने-बुहारने आदि संस्कारों से शुद्ध किया गया हो तथा सर्प-व्याघ्र आदि जन्तुओं से रहित हो, ऐसे वन, नदी-तीर या देवालय आदि विविक्त (एकान्त-पवित्र) देश को सेवन करने का जिसका स्वभाव है, वह विविक्तदेशसेवी कहलाता है, उसका भाव विविक्तदेशसेवित्व है।

क्योंकि निर्जन-पवित्र देश में ही चित्त प्रसन्न और स्वच्छ होता है, इसलिये विविक्तदेश में आत्मादि की भावना प्रकट होती है, अतः विविक्तदेश-सेवन करने के स्वभाव को ‘ज्ञान’ कहा जाता है।

तथा जनसमुदाय में अप्रीति। यहाँ विनय-भावरहित संस्कार-शून्य प्राकृत पुरुषों के समुदाय का नाम ही जनसमुदाय है। विनययुक्त संस्कारसम्पन्न मनुष्यों का समुदाय जनसमुदाय नहीं है; क्योंकि वह तो ज्ञान में सहायक है। सुतरां प्राकृतजनसमुदाय में प्रीति का अभाव ज्ञान का साधन होने के कारण ‘ज्ञान’ है ॥ १० ॥

तात्पर्य पढ़ें

किं च—

तथा—

मयि च ईश्वरे अनन्ययोगेन अपृथक्समाधिना न अन्यो भगवतो वासुदेवात् परः अस्ति अतः स एव नो गतिः इति एवं निश्चिता अव्यभि-चारिणी बुद्धिः अनन्ययोगः तेन भजनं भक्तिः न व्यभिचरणशीला अव्यभिचारिणी । सा च ज्ञानम् ।

विविक्तदेशसेवित्वं विविक्तः स्वभावतः संस्कारेण वा अशुच्यादिभिः सर्पव्याघ्रादिभिः च रहितः अरण्यनदीपुलिनदेवगृहादिभिः विविक्तो देशः तं सेवितुं शीलम् यस्य इति विविक्तदेशसेवी तद्भावो विविक्तदेशसेवित्वम् ।

विविक्तेषु हि देशेषु चित्तं प्रसीदति यतः तत आत्मादिभावना विविक्ते उपजायते अतो विविक्तदेशसेवित्वं ज्ञानम् उच्यते।

अरतिः अरमणं जनसंसदि जनानां प्राकृतानां संस्कारशून्यानाम् अविनीतानां संसत् समवायो जनसंसत् न संस्कारवतां विनीतानां संसत्, तस्या ज्ञानोपकारकत्वात्, अतः प्राकृतजनसंसदि अरतिः ज्ञानार्थत्वाद् ज्ञानम् ॥ १० ॥