तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् ।
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा ॥ ११ ॥
adhyātmajñānanityatvaṃ
tattvajñānārthadarśanam .
etajjñānamiti proktamajñānaṃ yadato’nyathā .. 11 ..
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वम् आत्मादिविषयक ज्ञान का नाम अध्यात्मज्ञान है, उसमें नित्यस्थिति।
तत्त्वज्ञानके अर्थकी आलोचना अर्थात् अमानित्वादि ज्ञान-साधनों की परिपक्व भावनासे उत्पन्न होनेवाला जो तत्त्वज्ञान है उसका अर्थ जो संसारकी उपरतिरूप मोक्ष है, उसकी आलोचना। क्योंकि तत्त्वज्ञान के फल की आलोचना करनेसे ही उसके साधनों में प्रवृत्ति होगी।
‘अमानित्व’ से लेकर तत्त्वज्ञानके अर्थकी आलोचनापर्यन्त कहा हुआ समस्त साधनसमुदाय ज्ञानका साधन होनेके कारण ‘ज्ञान’ इस नामसे कहा गया है।
इससे अर्थात् उपर्युक्त ज्ञानसाधनोंके समुदायसे विपरीत जो मानित्व, दम्भित्व, हिंसा, क्षमाका अभाव, कुटिलता इत्यादि अवगुणसमुदाय है वह संसार में प्रवृत्त करनेका हेतु होनेसे उसे त्याग करने के लिये अज्ञान समझना चाहिये ॥ ११ ॥
उपर्युक्त ज्ञान द्वारा जाननेयोग्य क्या है? इस आकाङ्क्षापर ‘ज्ञेयं यत्तत्’ इत्यादि श्लोक कहते हैं—
पू० —अमानित्व आदि गुण तो यम और नियम हैं, उनसे ज्ञेय वस्तु नहीं जानी जा सकती; क्योंकि अमानित्वादि सद्गुण किसी वस्तु के ज्ञापक नहीं देखे गये हैं। सभी जगह यह देखा जाता है कि जो ज्ञान जिस वस्तुको विषय करनेवाला होता है वही उसका ज्ञापक होता है, अन्य वस्तु विषयक ज्ञानसे अन्य वस्तु नहीं जानी जाती। जैसे घट विषयक ज्ञानसे अग्नि नहीं जाना जाता।
उ०—यह दोष नहीं है, क्योंकि हम पहले ही कह चुके हैं कि यह अमानित्वादि सद्गुण ज्ञानके साधन होनेसे और उसके सहकारी कारण होनेसे ‘ज्ञान’ नामसे कहे गये हैं—
तात्पर्य पढ़ें
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वम् आत्मादिविषयं ज्ञानम् अध्यात्मज्ञानं तस्मिन् नित्यभावो नित्यत्वम्।
अमानित्वादीनां ज्ञानसाधनानां भावना-परिपाकनिमित्तं तत्त्वज्ञानं तस्य अर्थो मोक्षः संसारोपरमः तस्य आलोचनं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्, तत्त्वज्ञानफलालोचने हि तत्साधनानुष्ठाने प्रवृत्तिः स्याद् इति।
एतद् अमानित्वादितत्त्वज्ञानार्थदर्शनान्तम् उक्तं
ज्ञानम् इति प्रोक्तं ज्ञानार्थत्वात् ।
अज्ञानं यद् अतः अस्माद् यथोक्ताद् अन्यथा विपर्ययेण मानित्वं दम्भित्वं हिंसा अक्षान्तिः अनार्जवम् इत्यादि अज्ञानं विज्ञेयं परिहरणाय संसारप्रवृत्तिकारणत्वाद् इति ॥ ११ ॥
यथोक्तेन ज्ञानेन ज्ञातव्यं किम् इति आकाङ्क्षायाम् आह ज्ञेयं यत् तद् इत्यादि।
ननु यमा नियमाः च अमानित्वादयो न तैः ज्ञेयं ज्ञायते। न हि अमानित्वादि कस्यचिद् वस्तुनः परिच्छेदकं दृष्टम्। सर्वत्र एव च यद् विषयं ज्ञानं तद् एव तस्य ज्ञेयस्य परिच्छेदकं दृश्यते। न हि अन्यविषयेण ज्ञानेन अन्यद् उपलभ्यते। यथा घटविषयेण ज्ञानेन अग्निः।
न एष दोषो ज्ञाननिमित्तत्वाद् ज्ञानम् उच्यते इति हि अवोचाम । ज्ञानसहकारिकारण-त्वात् च—