ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि
यज्ञात्वामृतमश्नुते ।
अनादिमत्परं ब्रह्म न
सत्तन्नासदुच्यते ॥ १२ ॥
proktamajñānaṃ
jñeyaṃ yattatpravakṣyāmi
yajñātvāmṛtamaśnute .
anādimatparaṃ brahma na
sattannāsaducyate .. 12 ..
जो जाननेयोग्य है उसको भली प्रकार यथार्थ रूपसे कहूँगा।
वह ज्ञेय कैसे फलवाला है? यह बात, श्रोतामें रुचि उत्पन्न करके उसे सम्मुख करनेके लिये कहते हैं—
जिस जाननेयोग्य (परमात्माके स्वरूप)-को जानकर (मनुष्य) अमृतको अर्थात् अमरभावको लाभ कर लेता है, फिर नहीं मरता।
वह ज्ञेय अनादिमत् है। जिसकी आदि हो वह आदिमत् और जो आदिमत् न हो वह अनादिमत् कहलाता है। वह कौन है? वही परम—निरतिशय ब्रह्म जो कि इस प्रकरणमें ज्ञेयरूपसे वर्णित है।
यहाँ कई एक टीकाकार ‘अनादि’ ‘मत्परम्’ इस प्रकार पदच्छेद करते हैं। (कारण यह बतलाते हैं कि) बहुव्रीहि समासद्वारा बतलाये हुए अर्थमें ‘मतुप्’ प्रत्ययके प्रयोगकी निरर्थकता है, अतः वह अनिष्ट है।
वे (टीकाकार ऐसा पदच्छेद करके) अलग अर्थ भी दिखाते हैं कि ‘मैं वासुदेव कृष्ण ही जिसकी परम शक्ति हूँ वह ज्ञेय मत्पर है।’
ठीक है, यदि उपर्युक्त अर्थ सम्भव होता तो ऐसा पदच्छेद करनेसे पुनरुक्तिके दोषका निवारण हो सकता था, परंतु यह अर्थ ही सम्भव नहीं है; क्योंकि यहाँ ब्रह्मका स्वरूप ‘न सत्तन्नासदुच्यते’ आदि वचनोंसे सर्व विशेषणोंके प्रतिषेधद्वारा ही बतलाना इष्ट है।
ज्ञेयको किसी विशेष शक्ति वाला बतलाना और विशेषणों का प्रतिषेध भी करते जाना यह परस्परविरुद्ध है। सुतरां (यही समझना चाहिये कि) मतुप् प्रत्ययका और बहुव्रीहि समासका समान अर्थ होनेपर भी यहाँ श्लोकपूर्तिके लिये यह प्रयोग किया गया है।
‘जिसका फल अमृतत्व है ऐसा ज्ञेय मेरे द्वारा कहा जाता है’ इस कथनसे रुचि उत्पन्न कर (अर्जुनको) सम्मुख करके कहते हैं—
उस ज्ञेयको न सत् कहा जा सकता है और न असत् ही कहा जा सकता है।
पू०—कटिबद्ध होकर बड़े गम्भीर स्वरसे यह घोषणा करके कि ‘मैं ज्ञेय वस्तुको भली प्रकार बतलाऊँगा’ फिर यह कहना कि ‘वह न सत् कहा जा सकता है और न असत् ही’ उस घोषणाके अनुरूप नहीं है।
उ०—यह नहीं, भगवान्का कहना तो प्रतिज्ञाके अनुरूप ही है; क्योंकि वाणीका विषय न होनेके कारण सब उपनिषदोंमें भी ज्ञेय ब्रह्म ‘ऐसा नहीं, ऐसा नहीं’ ‘स्थूल नहीं, सूक्ष्म नहीं’ इस प्रकार विशेषोंके प्रतिषेधद्वारा ही लक्ष्य कराया गया है, ऐसा नहीं कहा गया कि वह ज्ञेय अमुक है।
पू०—जो वस्तु ‘अस्ति’ शब्दसे नहीं कही जा सकती, वह है भी नहीं। यदि ज्ञेय ‘अस्ति’ शब्दसे नहीं कहा जा सकता तो वह भी वास्तवमें नहीं है। फिर यह कहना अति विरुद्ध है कि वह ‘ज्ञेय’ है और ‘अस्ति’ शब्दसे नहीं कहा जा सकता।
उ०—वह (ब्रह्म) नहीं है, सो नहीं; क्योंकि वह ‘नहीं है’ इस ज्ञानका भी विषय नहीं है।
पू०—सभी ज्ञान ‘अस्ति’ या ‘नास्ति’ इन बुद्धियोंमेंसे ही किसी एकके अनुगत होते हैं। इसलिये ज्ञेय भी या तो ‘अस्ति’ ज्ञानसे अनुगत प्रतीतिका विषय होगा या ‘नास्ति’ ज्ञानसे अनुगत प्रतीतिका विषय होगा।
उ०—यह बात नहीं है। क्योंकि वह ब्रह्म इन्द्रियोंसे अगोचर होनेके कारण दोनों प्रकारके ही ज्ञानसे अनुगत प्रतीतिका विषय नहीं है।
इन्द्रियोंद्वारा जाननेमें आनेवाले जो कोई घट आदि पदार्थ होते हैं, वे ही या तो ‘अस्ति’ इस ज्ञानसे अनुगत प्रतीतिके या ‘नास्ति’ इस ज्ञानसे अनुगत प्रतीतिके विषय होते हैं।
परंतु यह ज्ञेय (ब्रह्म) इन्द्रियातीत होनेके कारण केवल एक शब्दप्रमाणसे ही प्रमाणित हो सकता है, इसलिये घट आदि पदार्थोंकी भाँति यह ‘है’ ‘नहीं है’ इन दोनों प्रकारके ही ज्ञानोंके अनुगत प्रतीतिका विषय नहीं है, सुतरां वह न तो सत् कहा जा सकता है और न असत् ही कहा जा सकता है।
तथा तुमने जो यह कहा कि ज्ञेय है किंतु वह न सत् कहा जाता है और न असत् कहा जाता है, यह कहना विरुद्ध है, सो विरुद्ध नहीं है; क्योंकि ‘वह ब्रह्म जाने हुएसे और न जाने हुएसे भी अन्य है’ इस श्रुतिप्रमाणसे यह बात सिद्ध है।
पू०—यदि यह श्रुति भी विरुद्ध अर्थवाली हो तो? अर्थात् जैसे यज्ञके लिये यज्ञशाला बनानेका विधान करके वहाँ कहा है कि ‘उस बातको कौन जानता है कि परलोकमें यह सब है या नहीं’ इस श्रुतिके समान यह श्रुति भी विरुद्धार्थयुक्त हो तो?
उ०—यह बात नहीं है; क्योंकि यह जाने हुएसे और न जाने हुएसे विलक्षणत्व प्रतिपादन करनेवाली श्रुति निस्सन्देह अवश्य ही ज्ञेय पदार्थका होना प्रतिपादन करनेवाली है और ‘यह सब परलोकमें है या नहीं’ इत्यादि श्रुति-वाक्य विधिके अन्तका अर्थवाद है (अत: उसके साथ इसकी समानता नहीं हो सकती)।
युक्तिसे भी यह बात सिद्ध है कि ब्रह्म सत्-असत् आदि शब्दोंद्वारा नहीं कहा जा सकता; क्योंकि अर्थका प्रकाश करनेके लिये वक्ताद्वारा बोले जानेवाले और श्रोताद्वारा सुने जानेवाले सभी शब्द जाति, क्रिया, गुण और सम्बन्धद्वारा संकेत ग्रहण करवाकर ही अर्थकी प्रतीति कराते हैं, अन्य प्रकारसे नहीं। कारण, अन्य प्रकारसे प्रतीति होती नहीं देखी जाती।
जैसे गौ या घोड़ा यह जातिसे, पकाना या पढ़ना यह क्रियासे, सफेद या काला यह गुणसे और धनवान् या गौओंवाला यह सम्बन्धसे (जाने जाते हैं। इसी तरह सबका ज्ञान होता है)।
परंतु ब्रह्म जातिवाला नहीं है, इसलिये सत् आदि शब्दोंद्वारा नहीं कहा जा सकता; निर्गुण होनेके कारण वह गुणवान् भी नहीं है, जिससे कि गुणवाचक शब्दोंसे कहा जा सके और क्रियारहित होनेके कारण क्रियावाचक शब्दोंसे भी नहीं कहा जा सकता। ‘ब्रह्म कलारहित, क्रियारहित और शान्त है’ इस श्रुतिसे भी यही बात सिद्ध होती है।
तथा एक, अद्वितीय, इन्द्रियोंका अविषय और आत्मरूप होनेके कारण (वह ब्रह्म) किसीका सम्बन्धी भी नहीं है। अतः यह कहना उचित ही है कि ब्रह्म किसी भी शब्दसे नहीं कहा जा सकता। ‘जहाँसे वाणी निवृत्त हो जाती है’ इत्यादि श्रुति-प्रमाणोंसे भी यही बात सिद्ध होती है ॥ १२ ॥
वह ‘ज्ञेय’ सत् शब्दद्वारा होनेवाली प्रतीतिका विषय नहीं है, इससे उसके न होनेकी आशङ्का होनेपर उस आशङ्काकी निवृत्तिके लिये, समस्त प्राणियोंकी इन्द्रियादि उपाधियोंद्वारा उस ज्ञेयके अस्तित्वका प्रतिपादन करते हुए कहते हैं—
तात्पर्य पढ़ें
ज्ञेयं ज्ञातव्यं यत् तत् प्रवक्ष्यामि प्रकर्षेण यथावद् वक्ष्यामि।
किं फलं तद् इति प्ररोचनेन श्रोतुः अभि-मुखीकरणाय आह—
यद् ज्ञेयं ज्ञात्वा अमृतम् अमृतत्वम् अश्नुते
न पुनः प्रियते इत्यर्थः ।
अनादिमद् आदिः अस्य अस्ति इति आदि-
मद् न आदिमद् अनादिमत्। किं तत्, परं निरतिशयं ब्रह्म ज्ञेयम् इति प्रकृतम्।
अत्र केचिद् अनादि मत्परम् इति पदं
छिन्दन्ति बहुव्रीहिणा उक्ते अर्थे मतुप आनर्थक्यम् अनिष्टं स्याद् इति।
अर्थविशेषं च दर्शयन्ति अहं वासुदेवाख्या
परा शक्तिः यस्य तद् मत्परम् इति।
सत्यम् एवम् अपुनरुक्तं स्याद् अर्थः चेत्
सम्भवति न तु अर्थः सम्भवति, ब्रह्मणः
सर्वविशेषप्रतिषेधेन एव विजिज्ञापयिषितत्वाद् न सत् तद् न असद् उच्यते इति।
विशिष्टशक्तिमत्त्वप्रदर्शनं विशेषप्रतिषेधः च
इति विप्रतिषिद्धम् । तस्माद् मतुपो बहुव्रीहिणा
समानार्थत्वे अपि प्रयोगः श्लोकपुरुणार्थः ।
अमृतत्वफलं ज्ञेयं मया उच्यते इति प्ररोचनेन
न सत् तद् ज्ञेयम् उच्यते इति न अपि असत् तद् उच्यते।
ननु महता परिकरबन्धेन कण्ठरवेण उद्धुष्य
ज्ञेयं प्रवक्ष्यामि इति अननुरूपम् उक्तं न सत् तद् न असद् उच्यते इति।
न, अनुरूपम् एव उक्तम्। कथं सर्वासु हि उपनिषत्सु ज्ञेयं ब्रह्म ‘नेति नेति’ (बृह० उ० ४।४।२२) ‘अस्थूलमनणु’ (बृह० उ० ३।३।८) इत्यादिविशेषप्रतिषेधेन एव निर्दिश्यते न इदं तद् इति वाचः अगोचरत्वात्।
ननु न तद् अस्ति यद् वस्तु अस्तिशब्देन न उच्यते। अथ अस्तिशब्देन न उच्यते न अस्ति तद् ज्ञेयम्। विप्रतिषिद्धं च ज्ञेयं तद् अस्तिशब्देन न उच्यते इति च।
न तावद् न अस्ति नास्तिबुद्ध्यविषयत्वात्।
ननु सर्वा बुद्धयः अस्तिनास्तिबुद्ध्यनुगता एव । तत्र एवं सति ज्ञेयम् अपि अस्तिबुद्ध्यनुगत-प्रत्ययविषयं वा स्याद् नास्तिबुद्ध्यनुगतप्रत्यय-विषयं वा स्यात् ।
न, अतीन्द्रियत्वेन उभयबुद्ध्यनुगतप्रत्यया-
विषयत्वात् ।
यद् हि इन्द्रियगम्यं वस्तु घटादिकं तद् अस्तिबुद्ध्यनुगतप्रत्ययविषयं वा स्याद् नास्तिबुद्ध्यनुगतप्रत्ययविषयं वा स्यात् ।
इदं तु ज्ञेयम् अतीन्द्रियत्वेन शब्दैकप्रमाण-गम्यत्वाद् न घटादिवद् उभयबुद्ध्यनुगत-प्रत्ययविषयम् इति अतो न सत् तद् न असद् इति उच्यते।
यत् तु उक्तं विरुद्धम् उच्यते ज्ञेयं तद् न सत् तद् न असद् उच्यते इति। न विरुद्धम्। ‘अन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादधि’ (के० उ० १। ३) इति श्रुतेः।
श्रुतिः अपि विरुद्धार्था इति चेद् यथा यज्ञाय शालाम् आरभ्य ‘को हि तद् वेद यद्यमुष्मिल्लोकेऽस्ति वा न वेति’ (तै० सं० ६।१।१) एवम् इति चेत्।
न, विदिताविदिताभ्याम् अन्यत्वश्रुतेः
अवश्यविज्ञेयार्थप्रतिपादनपरत्वात्। ‘यद्यमुष्मिन्’
इत्यादि तु विधिशेषः अर्थवादः ।
उपपत्तेः च सदसदादिशब्दैः ब्रह्म न उच्यते इति। सर्वो हि शब्दः अर्थप्रकाशनाय प्रयुक्तः श्रूयमाणः च श्रोतृभिः जातिक्रिया-गुणसम्बन्धद्वारेण सङ्केतग्रहणसव्यपेक्षः अर्थं प्रत्याययति। न अन्यथा अदृष्टत्वात्।
तद् यथा गौः अश्व इति वा जातितः, पचति पठति इति वा क्रियातः, शुक्लः कृष्ण इति वा गुणतः, धनी गोमान् इति वा सम्बन्धतः।
न तु ब्रह्म जातिमद् अतो न सदादिशब्द- वाच्यं न अपि गुणवद् येन गुणशब्देन उच्येत निर्गुणत्वाद् न अपि क्रियाशब्दवाच्यं निष्क्रियत्वात्। ‘निष्कलं निष्क्रियं शान्तम्’ (श्वे० उ० ६। १९) इति श्रुतेः।
न च सम्बन्धि एकत्वाद् अद्वयत्वाद् अविषयत्वाद् आत्मत्वात् च न केनचित् शब्देन उच्यते इति युक्तम् ‘यतो वाचो निवर्तन्ते’ (तै० उ० २।४।९) इत्यादि श्रुतिभ्यः च ॥ १२ ॥
सच्छब्दप्रत्ययाविषयत्वाद् असत्त्वाशङ्कायां ज्ञेयस्य सर्वप्राणिकरणोपाधिद्वारेण तदस्तित्वं प्रतिपादयन् तदाशङ्कानिवृत्त्यर्थम् आह—
सच्छब्दप्रत्ययाविषयत्वाद् असत्त्वाशङ्कायां ज्ञेयस्य सर्वप्राणिकरणोपाधिद्वारेण तदस्तित्वं प्रतिपादयन् तदाशङ्कानिवृत्त्यर्थम् आह—