सर्वेन्द्रियगुणाभासं
सर्वेन्द्रियविवर्जितम् ।
असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च ॥ १४ ॥
sarvamāvṛtya
sarvendriyaguṇābhāsaṃ
sarvendriyavivarjitam .
asaktaṃ sarvabhṛccaiva nirguṇaṃ guṇabhoktṛ ca .. 14 ..
वह ज्ञेय समस्त इन्द्रियोंके गुणोंसे अवभासित (प्रतीत) होनेवाला है। यहाँ श्रोत्रादि ज्ञानेन्द्रियाँ, वाक् आदि कर्मेन्द्रियाँ तथा मन और बुद्धि ये दोनों अन्तःकरण—इन सबका सर्व इन्द्रियोंके नामसे ग्रहण है; क्योंकि अन्तःकरण भी ज्ञेयकी उपाधिके रूपमें अन्य इन्द्रियोंके समान ही है, बल्कि श्रोत्रादिका भी उपाधित्व अन्तःकरणरूप उपाधिके द्वारा ही है।
इसलिये यह अभिप्राय है कि उपाधिरूप अन्तः-करण और बाह्यकरण, इन सभी इन्द्रियोंके गुण जो निश्चय, संकल्प, श्रवण और भाषण आदि हैं, उनके द्वारा वह ज्ञेय प्रतिभासित होता है अर्थात् उन इन्द्रियोंकी क्रियासे वह क्रियावान्-सा दिखलायी देता है।
‘ध्यान करता हुआ-सा, चेष्टा करता हुआ-सा’ इस श्रुतिसे भी यही सिद्ध होता है।
तो फिर उस ज्ञेयको स्वयं क्रिया करनेवाला ही क्यों नहीं मान लिया जाता? इसपर कहते हैं—
वह ज्ञेय समस्त इन्द्रियोंसे रहित है अर्थात् सब करणोंसे रहित है। इसलिये वह इन्द्रियोंके व्यापारसे (वास्तवमें) व्यापारवाला नहीं होता।
यह जो मन्त्र है कि ‘वह (ईश्वर) बिना पैर और हाथके चलता और ग्रहण करता है, बिना चक्षुके देखता और बिना कानोंके सुनता है’ सो इस अभिप्रायको दिखानेके लिये है कि वह ज्ञेय समस्त इन्द्रियरूप उपाधियोंके गुणोंकी अनुरूपता प्राप्त करनेमें समर्थ है, उसे साक्षात् गमनादि क्रियाओंसे युक्त बतलानेके लिये यह मन्त्र नहीं है।
‘अन्धेने मणि प्राप्त की’ इत्यादि मन्त्रोंके अर्थकी भाँति उस मन्त्रका अर्थ है!
वह ज्ञेय समस्त इन्द्रियोंसे रहित है, इसलिये संगरहित है अर्थात् सब प्रकारके सम्बन्धोंसे रहित है।
यद्यपि यह बात है तो भी वह ज्ञेय सबको धारण करनेवाला है। सद्बुद्धि सर्वत्र व्याप्त है, अतः सत् ही सबका अधिष्ठान है। मृगतृष्णिकादि मिथ्या पदार्थ भी बिना अधिष्ठानके नहीं होते, इसलिये वह ज्ञेय सबका धारण करनेवाला है।
उस ज्ञेयकी सत्ताको बतलानेवाला यह दूसरा साधन भी है। वह ज्ञेय निर्गुण यानी सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंसे अतीत है तो भी गुणोंका भोक्ता है अर्थात् वह ज्ञेय सुख-दुःख और मोहके रूपमें परिणत हुए तीनों गुणोंका शब्दादिद्वारा भोग करनेवाला—उन्हें उपलब्ध करनेवाला है ॥ १४ ॥
तथा—
तात्पर्य पढ़ें
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वाणि च तानि इन्द्रियाणि श्रोत्रादीनि बुद्धीन्द्रियकर्मेन्द्रियाख्यानि अन्तःकरणे च बुद्धिमनसी ज्ञेयोपाधित्वस्य तुल्यत्वात् सर्वेन्द्रियग्रहणेन गृह्यन्ते। अपि च अन्तःकरणोपाधिद्वारेण एव श्रोत्रादीनाम् अपि उपाधित्वम् इति।
अतः अन्तःकरणबहिष्करणोपाधिभूतैः सर्वेन्द्रियगुणैः अध्यवसायसङ्कल्पश्रवण-वचनादिभिः अवभासते इति सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियव्यापारैः व्यापृतम् इव तद् ज्ञेयम् इत्यर्थः ।
‘ध्यायतीव लेलायतीव’ (बृ० उ० ४।३।७) इति श्रुतेः।
कस्मात् पुनः कारणाद् न व्यापृतम् एव इति गृह्यते इति अत आह—
सर्वेन्द्रियविवर्जितं सर्वकरणरहितम् इत्यर्थः ।
अतो न करणव्यापारैः व्यापृतं तद् ज्ञेयम्।
यः तु अयं मन्त्रः—‘अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः’ (श्वे० उ० ३। १९) इत्यादिः स सर्वेन्द्रियोपाधिगुणानुगुण्य-भजनशक्तिमत् तद् ज्ञेयम् इति एवं प्रदर्शनार्थो न तु साक्षाद् एव जवनादिक्रियावत्त्व-प्रदर्शनार्थः ।
‘अन्धो मणिमविन्दत’ (तै० आ० १।११) इत्यादिमन्त्रार्थवत् तस्य मन्त्रस्य अर्थः।
यस्मात् सर्वकरणवर्जितं ज्ञेयं तस्माद्
असक्तं सर्वसंश्लेषवर्जितम् ।
यद्यपि एवं तथापि सर्वभृत् च एव। सदास्पदं हि सर्वं सर्वत्र सद्बुद्ध्यनुगमात्। न हि मृगतृष्णिकादयः अपि निरास्पदा भवन्ति। अतः सर्वभृत् सर्वं बिभर्ति इति।
स्याद् इदं च अन्यद् ज्ञेयस्य सत्त्वाधिगम-द्वारं निर्गुणं सत्त्वरजस्तमांसि गुणाः तैः वर्जितं तद् ज्ञेयं तथापि गुणभोक्तृ च गुणानां सत्त्वरजस्तमसां शब्दादिद्वारेण सुखदुःख-मोहाकारपरिणतानां भोक्तृ च उपलब्धृ तद् ज्ञेयम् इत्यर्थः ॥ १४ ॥