बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च ।
सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् ॥ १५ ॥
kiṃ ca—
bahirantaśca bhūtānāmacaraṃ carameva ca .
sūkṣmatvāttadavijñeyaṃ dūrasthaṃ cāntike ca tat .. 15 ..
अविद्याद्वारा आत्मभावसे कल्पित शरीरको त्वचापर्यन्त अवधि मानकर उसीकी अपेक्षासे ज्ञेयको उसके बाहर बतलाते हैं। वैसे ही अन्तरात्माको लक्ष्य करके तथा शरीरको ही अवधि मानकर ज्ञेयको उसके भीतर (व्याप्त) बतलाया जाता है।
बाहर और भीतर व्याप्त है—ऐसा कहनेसे मध्यमें उसका अभाव प्राप्त हुआ, इसलिये कहते हैं—
चर और अचररूप भी वही है अर्थात् रज्जुमें सर्पकी भाँति प्रतीत होनेवाले जो चर-अचररूप शरीरके आभास हैं, वह भी उस ज्ञेयका ही स्वरूप है।
यदि चर और अचररूप समस्त व्यवहारका विषय वह ज्ञेय (परमात्मा) ही है, तो फिर वह ‘यह है’ इस प्रकार सबसे क्यों नहीं जाना जा सकता? इसपर कहते हैं—
ठीक है, सारा दृश्य उसीका स्वरूप है, तो भी वह ज्ञेय आकाशकी भाँति अति सूक्ष्म है। अतः यद्यपि वह आत्मरूपसे ज्ञेय है, तो भी सूक्ष्म होनेके कारण अज्ञानियोंके लिये अविज्ञेय ही है।
ज्ञानी पुरुषों के लिये तो, ‘यह सब कुछ आत्मा ही है’ ‘यह सब कुछ ब्रह्म ही है’ इत्यादि प्रमाणोंसे वह सदा ही प्रत्यक्ष रहता है।
वह ज्ञेय अज्ञात होनेके कारण और हजारों-करोड़ों वर्षोंतक भी प्राप्त न हो सकनेके कारण अज्ञानियोंके लिये बहुत दूर है, किंतु ज्ञानियों का तो वह आत्मा ही है; अत: उनके निकट ही है ॥ १५ ॥
तथा—
तात्पर्य पढ़ें
बहिः त्वक्पर्यन्तं देहम् आत्मत्वेन अविद्या-कल्पितम् अपेक्ष्य तम् एव अवधिं कृत्वा बहिः उच्यते। तथा प्रत्यगात्मानम् अपेक्ष्य देहम् एव अवधिं कृत्वा अन्तः उच्यते।
बहिः अन्तः च इति उक्ते मध्ये अभावे प्राप्ते इदम् उच्यते—
अचरं चरम् एव च यत् चराचरं देहाभासम्
अपि तद् एव ज्ञेयं यथा रज्जुसर्पाभासः ।
यदि अचरं चरम् एव च व्यवहारविषयं सर्वं ज्ञेयं किमर्थम् इदम् इति सर्वैः न विज्ञेयम्, इति उच्यते—
सत्यम्, सर्वाभासं तत् तथापि व्योमवत् सूक्ष्मम् अतः सूक्ष्मत्वात् स्वेन रूपेण तद् ज्ञेयम् अपि अविज्ञेयम् अविदुषाम्।
विदुषां तु ‘आत्मैवेदं सर्वम्’ (छा० उ० ७।२५।२) ‘ब्रह्मैवेदं सर्वम्’ (बृह० उ० २।५।१) इत्यादिप्रमाणतो नित्यं विज्ञातम्—
अविज्ञाततया दूरस्थं वर्षसहस्रकोट्यापि अविदुषाम् अप्राप्यत्वाद् अन्तिके च तद् आत्मत्वाद् विदुषाम् ॥ १५ ॥