अध्याय 13 - श्लोक 18

इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः।
मद्धक्त एतद्विज्ञाय मद्धावायोपपद्यते ॥ १८ ॥

iti kṣetraṃ tathā jñānaṃ jñeyaṃ coktaṃ samāsataḥ.
maddhakta etadvijñāya maddhāvāyopapadyate .. 18 ..


इस प्रकार यह महाभूतों से लेकर धृतिपर्यन्त क्षेत्र का स्वरूप, ‘अमानित्व’ आदि से लेकर ‘तत्त्वज्ञानार्थदर्शन’ पर्यन्त ज्ञान का स्वरूप और ‘ज्ञेयं यत्तत्’ यहाँ से लेकर ‘तमसः परमुच्यते’ यहाँ तक ज्ञेय का स्वरूप, संक्षेप से कह दिया गया।

यह सब वेदों का और गीता का अर्थ इकट्ठा करके कहा गया है। इस यथार्थ ज्ञान का अधिकारी कौन है, सो कहा जाता है—

मेरा भक्त अर्थात् मुझ सर्वज्ञ, परमगुरु, वासुदेव परमेश्वर में अपने सारे भावों को जिसने अर्पण कर दिया है। जिस किसी भी वस्तु को देखता, सुनता और स्पर्श करता है, उस सब में ‘सब कुछ भगवान् वासुदेव ही हैं’ ऐसी निश्चित बुद्धिवाला जो मेरा भक्त है।

वह उपर्युक्त यथार्थ ज्ञान को समझकर मेरे भाव को अर्थात् मेरा जो परमात्मभाव है, उसको प्राप्त करने में समर्थ होता है, अर्थात् मोक्ष–लाभ कर लेता है ॥ १८ ॥

सातवें अध्याय में ईश्वर की क्षेत्र और क्षेत्रज्ञरूप अपरा और परा—दो प्रकृतियाँ बतलायी गयी हैं तथा यह भी कहा गया है कि ये दोनों प्रकृतियाँ समस्त प्राणियों की योनि (कारण) हैं। अब यह बात बतलायी जाती है कि वे क्षेत्र और क्षेत्रज्ञरूप दोनों प्रकृतियाँ सब भूतों की योनि किस प्रकार हैं—

तात्पर्य पढ़ें

इति एवं क्षेत्रं महाभूतादि धृत्यन्तं तथा ज्ञानम् अमानित्वादि तत्त्वज्ञानार्थदर्शनपर्यन्तं ज्ञेयं च ‘ज्ञेयं यत्तत्’ इत्यादि ‘तमसः परमुच्यते’ इत्येवमन्तम् उक्तं समासतः सङ्क्षेपतः।

एतावान् सर्वो हि वेदार्थो गीतार्थः च उपसंहृत्य उक्तः । अस्मिन् सम्यग्दर्शने कः अधिक्रियते इति उच्यते—

मद्भक्तो मयि ईश्वरे सर्वज्ञे परमगुरौ वासुदेवे समर्पितसर्वात्मभावो यत् पश्यति शृणोति स्पृशति वा सर्वम् एव भगवान् वासुदेव इति एवं ग्रहाविष्टबुद्धिः मद्भक्तः ।

स एतद् यथोक्तं सम्यग्दर्शनं विज्ञाय मद्भावाय मम भावो मद्भावः परमात्मभावः तस्मै मद्भावाय उपपद्यते मोक्षं गच्छति ॥ १८ ॥

तत्र सप्तमे ईश्वरस्य द्वे प्रकृती उपन्यस्ते परापरे क्षेत्रक्षेत्रज्ञलक्षणे । एतद्योनीनि भूतानि इति च उक्तम् । क्षेत्रक्षेत्रज्ञप्रकृतिद्वययोनित्वं कथं भूतानाम् इति अयम् अर्थः अधुना उच्यते—