विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान् ॥ १९ ॥
prakṛtiṃ puruṣaṃ caiva viddhyanādī ubhāvapi .
vikārāṃśca guṇāṃścaiva viddhi prakṛtisambhavān .. 19 ..
प्रकृति और पुरुष जो कि ईश्वरकी प्रकृतियाँ हैं, उन दोनोंको ही तू अनादि जान। जिनका आदि न हो उनका नाम अनादि है।
ईश्वरका ईश्वरत्व नित्य होनेके कारण उसकी दोनों प्रकृतियोंका भी नित्य होना उचित ही है; क्योंकि इन दोनों प्रकृतियोंसे युक्त होना ही ईश्वरकी ईश्वरता है।
जिन दोनों प्रकृतियोंद्वारा ईश्वर जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका कारण है, वे दोनों अनादिसिद्ध ही संसारकी कारण हैं।
कोई-कोई टीकाकार ‘जो आदि (कारण) नहीं हैं वे अनादि कहे जाते हैं, इस प्रकार यहाँ तत्पुरुष-समासका वर्णन करते हैं (और कहते हैं कि) इससे केवल ईश्वर ही जगत्का कारण है, यह बात सिद्ध होती है। यदि प्रकृति और पुरुषको नित्य माना जाय तो संसार उन्हींका रचा हुआ माना जायगा, ईश्वर जगत्का कर्ता सिद्ध न होगा।’
किंतु ऐसा मानना ठीक नहीं; क्योंकि (यदि प्रकृति और पुरुषको नित्य न माने तो) प्रकृति और पुरुषकी उत्पत्तिसे पूर्व शासन करने योग्य वस्तुका अभाव होनेसे ईश्वरमें अनीश्वरताका प्रसङ्ग आ जाता है।
तथा संसारको बिना निमित्तके उत्पन्न हुआ माननेसे उसके अन्तके अभावका प्रसङ्ग, शास्त्रकी व्यर्थताका प्रसङ्ग और बन्ध-मोक्षके अभावका प्रसङ्ग प्राप्त होता है, (इसलिये भी उपर्युक्त अर्थ ठीक नहीं है।)
परंतु ईश्वरकी इन दोनों प्रकृतियोंको नित्य मान लेनेसे यह सब व्यवस्था ठीक हो जाती है।
कैसे? (सो कहते हैं—)
विकारोंको और गुणोंको तू प्रकृतिसे उत्पन्न जान अर्थात् बुद्धिसे लेकर शरीर और इन्द्रियोंतक अगले श्लोकमें बतलाये हुए विकारोंको तथा सुख-दुःख और मोह आदि वृत्तियोंके रूपमें परिणत हुए तीनों गुणोंको तू प्रकृतिसे उत्पन्न हुए जान।
अभिप्राय यह है कि विकारोंकी कारणरूपा जो ईश्वरकी त्रिगुणमयी मायाशक्ति है, उसका नाम प्रकृति है। वह जिन विकारों और गुणोंको उत्पन्न करनेवाली है, उन विकारों और गुणोंको तू प्रकृतिजनित—प्रकृतिके ही परिणाम समझ॥ १९॥
प्रकृतिसे उत्पन्न हुए वे विकार और गुण कौन-से हैं?—
तात्पर्य पढ़ें
प्रकृतिं पुरुषं च एव ईश्वरस्य प्रकृती तौ प्रकृतिपुरुषौ उभौ अपि अनादी विद्धि। न विद्यते आदिः ययोः तौ अनादी।
नित्येश्वरत्वाद् ईश्वरस्य तत्प्रकृत्योः अपि युक्तं नित्यत्वेन भवितुम्। प्रकृतिद्वयवत्वम् एव हि ईश्वरस्य ईश्वरत्वम्।
याभ्यां प्रकृतिभ्याम् ईश्वरो जगदुत्पत्ति-स्थितिप्रलयहेतुः ते द्वे अनादी सत्यौ संसारस्य कारणम्।
न आदी अनादी इति तत्पुरुषसमासं केचिद् वर्णयन्ति। तेन हि किल ईश्वरस्य कारणत्वं
सिध्यति। यदि पुनः प्रकृतिपुरुषौ एव नित्यौ स्यातां तत्कृतम् एव जगद् न ईश्वरस्य जगतः कर्तृत्वम्।
संसारस्य निर्निमित्तत्वे अनिर्मोक्षत्वप्रसङ्गात् शास्त्रानर्थक्यप्रसङ्गाद् बन्धमोक्षाभावप्रसङ्गात् च।
नित्यत्वे पुनः ईश्वरस्य प्रकृत्योः सर्वम् एतद् उपपन्नं भवेत्।
विकारान् च गुणान् च एव वक्ष्यमाणान् विकारान् बुद्ध्यादिदेहेन्द्रियान् तान् गुणान् च सुखदुःखमोहप्रत्ययाकारपरिणतान् विद्धि जानीहि प्रकृतिसम्भवान्।
प्रकृतिः ईश्वरस्य विकारकारणशक्तिः त्रिगुणात्मिका माया सा सम्भवो येषां विकाराणां गुणानां च तान् विकारान् गुणान् च विद्धि प्रकृतिसम्भवान् प्रकृतिपरिणामान् ॥ १९ ॥
के पुनः ते विकारा गुणाः च प्रकृतिसम्भवाः—
के पुनः ते विकारा गुणाः च प्रकृतिसम्भवाः—