अध्याय 13 - श्लोक 20

तद् असत्, प्राक् प्रकृतिपुरुषयोः उत्पत्तेः
कथम्—
कार्यकरणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते ।
पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ॥ २० ॥

tad asat, prāk prakṛtipuruṣayoḥ utpatteḥ
katham—
kāryakaraṇakartṛtve hetuḥ prakṛtirucyate .
puruṣaḥ sukhaduḥkhānāṃ bhoktṛtve heturucyate .. 20 ..


कार्य शरीर को कहते हैं और उसमें स्थित (मन, बुद्धि, अहंकार तथा दस इन्द्रियाँ—ये) तेरह करण हैं। इनके कर्तापन में (हेतु प्रकृति है)।

शरीर को उत्पन्न करनेवाले पाँच भूत और शब्द आदि पाँच विषय ये पहले कहे हुए प्रकृतिजन्य दस विकार तो यहाँ कार्य के ग्रहण से ग्रहण किये जाते हैं और सुख-दुःख, मोह आदिके रूपमें परिणत हुए प्रकृतिजन्य समस्त गुण बुद्धि आदि करणों के आश्रित होनेके कारण करणों के ग्रहण से ग्रहण किये जाते हैं।

‘उन कार्य और करणों का जो कर्तापन अर्थात् उनको उत्पन्न करनेका भाव है उसका नाम कार्यकरण-कर्तृत्व है, उन कार्यकरणों के कर्तृत्व में आरम्भ करनेवाली होनेसे प्रकृति कारण कही जाती है। इस प्रकार कार्यकरणों को उत्पन्न करनेवाली होनेसे प्रकृति संसार की कारण है।

‘कार्यकारणकर्तृत्वे’ ऐसा पाठ माननेसे भी यही अर्थ होगा कि जो जिसका परिणाम है, वह उसका कार्य अर्थात् विकार है और कारण विकारी—विकृत होनेवाला—है। उन विकारी और विकाररूप कारण और कार्यों के उत्पन्न करनेमें (प्रकृति हेतु है)।

अथवा सोलह विकार तो कार्य और सात प्रकृति-विकृति कारण हैं, इस प्रकार ये (तेईस तत्त्व) ही कार्यकारण के नामसे कहे जाते हैं। इनके कर्तापन में प्रारम्भकत्व से ही प्रकृति हेतु कही जाती है।

पुरुष भी जिस प्रकार संसार का कारण होता है, सो कहा जाता है—

पुरुष अर्थात् जीव, क्षेत्रज्ञ, भोक्ता इत्यादि जिसके पर्याय शब्द हैं, वह सुख-दुःख आदि भोगों के भोक्तापन में अर्थात् उनका उपभोग करनेमें हेतु कहा जाता है।

पू०—परंतु इस कार्यकरण के कर्तापन से और सुख-दुःख के भोक्तापन से प्रकृति और पुरुष दोनों को संसार का कारण कैसे बतलाया जाता है ?

उ०—कार्यकरण और सुख-दुःखादिरूप हेतु और फलके आकारमें प्रकृतिका परिणाम न होनेपर तथा चेतन पुरुषमें उन सबका भोक्तापन न होनेसे संसार कैसे सिद्ध होगा। जब कार्यकरणरूप हेतु और फलके आकारमें परिणत हुई भोग्यरूपा प्रकृतिके साथ उससे विपरीत धर्मवाले पुरुषका, भोक्ता भावसे अविद्यारूप संयोग होगा, तभी संसार (प्रतीत) होगा।

इसलिये प्रकृति के कार्यकरणविषयक कर्तापन और पुरुष के सुख-दुःखविषयक भोक्तापन को लेकर जो उन दोनों का संसार-कारणत्व प्रतिपादन किया गया, वह उचित ही है।

पू०—तो यह संसारनामक वस्तु क्या है?

उ०—सुख-दुःखों का भोग ही संसार है और पुरुष में जो सुख-दुःखों का भोक्तृत्व है, यही उसका संसारित्व है ॥ २० ॥

यह जो कहा कि सुख-दुःखों का भोक्तृत्व ही पुरुषका संसारित्व है, सो वह उसमें किस कारणसे है ? यह बतलाते हैं—

तात्पर्य पढ़ें

कार्यकरणकर्तृत्वे कार्य शरीरं करणानि तत्स्थानि त्रयोदश ।

देहस्य आरम्भकाणि भूतानि विषयाः च प्रकृतिसम्भवा विकाराः पूर्वोक्ता इह कार्यग्रहणेन गृह्यन्ते, गुणाः च प्रकृतिसम्भवाः सुखदुःख-मोहात्मकाः करणाश्रयत्वात् करणग्रहणेन गृह्यन्ते।

तेषां कार्यकरणानां कर्तृत्वम् उत्पादकत्वं यत् तत् कार्यकरणकर्तृत्वं तस्मिन् कार्यकरण-कर्तृत्वे हेतुः कारणम् आरम्भकत्वेन प्रकृतिः उच्यते। एवं कार्यकरणकर्तृत्वेन संसारस्य कारणं प्रकृतिः।

कार्यकारणकर्तृत्वे इति अस्मिन् अपि पाठे कार्यं यद् यस्य विपरिणामः तत् तस्य कार्यं विकारो विकारि कारणं तयोः विकार-विकारिणोः कार्यकारणयोः कर्तृत्वे इति।

अथवा षोडश विकाराः कार्यम्, सप्त प्रकृतिविकृतयः कारणम्, तानि एव कार्यकारणानि उच्यन्ते। तेषां कर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिः उच्यते आरम्भकत्वेन एव।

पुरुषः च संसारस्य कारणं यथा स्यात् तद् उच्यते—

पुरुषोः जीवः क्षेत्रज्ञो भोक्ता इति पर्यायः सुखदुःखानां भोग्यानां भोक्तृत्वे उपलब्धृत्वे हेतुः उच्यते ।

कथं पुनः अनेन कार्यकरणकर्तृत्वेन सुख-दुःखभोक्तृत्वेन च प्रकृतिपुरुषयोः संसार-कारणत्वम् उच्यते इति।

अत्र उच्यते । कार्यकरणसुखदुःखरूपेण हेतुफलात्मना प्रकृतेः परिणामाभावे पुरुषस्य चेतनस्य असति तदुपलब्धृत्वे कुतः संसारः स्यात् । यदा पुनः कार्यकरणरूपेण हेतुफलात्मना परिणतया प्रकृत्या भोग्यया पुरुषस्य तद्विपरीतस्य भोक्तृत्वेन अविद्यारूपः संयोगः स्यात् तदा संसारः स्याद् इति ।

अतो यत् प्रकृतिपुरुषयोः कार्यकरणकर्तृत्वेन सुखदुःखभोक्तृत्वेन च संसारकारणत्वम् उक्तं तद् युक्तम् ।

कः पुनः अयं संसारो नाम,

सुखदुःखसम्भोगः संसारः पुरुषस्य च सुखदुःखानां सम्भोक्तृत्वं संसारित्वम् इति ॥ २० ॥

यत् पुरुषस्य सुखदुःखानां भोक्तृत्वं संसारित्वम् इति उक्तं तस्य तत् किन्निमित्तम् इति उच्यते—