अध्याय 13 - श्लोक 21

पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान् ।
कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु ॥ २१ ॥

puruṣaḥ prakṛtistho hi bhuṅkte prakṛtijānguṇān .
kāraṇaṃ guṇasaṅgo’sya sadasadyonijanmasu .. 21 ..


क्योंकि पुरुष—जीवात्मा प्रकृतिमें स्थित है अर्थात् कार्य और करणके रूपमें परिणत हुई अविद्यारूपा प्रकृतिमें स्थित है—प्रकृतिको अपना स्वरूप मानता है, इसलिये वह प्रकृतिसे उत्पन्न हुए सुख-दुःख और मोहरूपसे प्रकट गुणोंको ‘मैं सुखी हूँ, दुःखी हूँ, मूढ़ हूँ, पण्डित हूँ’ इस प्रकार मानता हुआ भोगता है अर्थात् उनका उपभोग करता है।

यद्यपि जन्मका कारण अविद्या है तो भी भोगे जाते हुए सुख-दुःख और मोहरूप गुणोंमें जो आसक्त हो जाना है—तद्रूप हो जाना है, वह जन्मरूप संसारका प्रधान कारण है। ‘वह जैसी कामनावाला होता है वैसा ही कर्म करता है’ इस श्रुतिसे भी यही बात सिद्ध होती है।

इसी बातको भगवान् कहते हैं कि गुणोंका सङ्ग ही अर्थात् गुणोंमें जो आसक्ति है वही इस भोक्ता पुरुषके अच्छी-बुरी योनियोंमें जन्म लेनेका कारण है।

अच्छी और बुरी योनियोंका नाम सदसत् योनि है, उनमें जन्मोंका होना सदसद्योनिजन्म है, इन भोग्यरूप सदसद्योनिजन्मोंका कारण गुणोंका सङ्ग ही है।

अथवा संसारपदका अध्याहार करके यह अर्थ कर लेना चाहिये कि अच्छी और बुरी योनियोंमें जन्म लेकर गुणोंका सङ्ग करना ही इस संसारका कारण है।

देवादि योनियाँ सत् योनि हैं और पशु आदि योनियाँ असत् योनि हैं। प्रकरणकी सामर्थ्यसे मनुष्य-योनियोंको भी सत्-असत् योनियाँ माननेमें (किसी प्रकारका) विरोध नहीं समझना चाहिये।

कहनेका तात्पर्य यह है कि प्रकृतिमें स्थित होनारूप अविद्या और गुणोंका सङ्ग—आसक्ति ये ही दोनों संसारके कारण हैं और वे छोड़नेके लिये ही बतलाये गये हैं।

गीताशास्त्रमें इनकी निवृत्तिके साधन संन्यासके सहित ज्ञान और वैराग्य प्रसिद्ध हैं।

वह क्षेत्रक्षेत्रज्ञविषयक ज्ञान पहले बतलाया ही गया है। साथ ही (‘न सत्तन्नासदुच्यते’ इत्यादि कथनसे) अन्यों (धर्मों)-का निषेध करके और (‘सर्वतः पाणिपादम्’ इत्यादि कथनसे) अनात्म धर्मोंका अध्यारोप करके ज्ञेयके स्वरूपका भी ‘यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते’ आदि वचनोंसे प्रतिपादन किया गया है ॥ २१ ॥

उसीका फिर साक्षात् निर्देश किया जाता है—

तात्पर्य पढ़ें

पुरुषो भोक्ता प्रकृतिस्थः प्रकृतौ अविद्या-लक्षणायां कार्यकरणरूपेण परिणतायां स्थितः प्रकृतिस्थः प्रकृतिम् आत्मत्वेन गत इति एतद् हि यस्मात् तस्माद् भुङ्क्ते उपलभते इत्यर्थः । प्रकृतिजान् प्रकृतितो जातान् सुखदुःख-मोहाकाराभिव्यक्तान् गुणान् सुखी दुःखी मूढः पण्डितः अहम् इति एवम् ।

सत्याम् अपि अविद्यायां सुखदुःखमोहेषु गुणेषु भुज्यमानेषु यः सङ्ग आत्मभावः संसारस्य स प्रधानं कारणं जन्मनः ‘स यथाकामो भवति तत्क्रतुर्भवति’ (बृ० उ० ४। ४। ५) इत्यादि श्रुतेः ।

सत्यः च असत्यः च योनयः सदसद्योनयः तासु सदसद्योनिषु जन्मानि सदसद्योनिजन्मानि तेषु सदसद्योनिजन्मसु विषयभूतेषु कारणं गुणसङ्गः ।

अथवा सदसद्योनिजन्मसु अस्य संसारस्य

कारणं गुणसङ्ग इति संसारपदम् अध्याहार्यम् ।

सद्योनयो देवादियोनयः असद्योनयः

पश्वादियोनयः । सामर्थ्यात् सदसद्योनयो

मनुष्ययोनयः अपि अविरुद्धा द्रष्टव्याः ।

एतद् उक्तं भवति प्रकृतिस्थत्वाख्या अविद्या

गुणेषु स सङ्गः कामः संसारस्य कारणम् इति ।

तत् च परिवर्जनाय उच्यते।

अस्य च निवृत्तिकारणं ज्ञानवैराग्ये ससंन्यासे गीताशास्त्रे प्रसिद्धम्।

तत् च ज्ञानं पुरस्ताद् उपन्यस्तं क्षेत्रक्षेत्रज्ञ-

विषयम्। ‘यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते’ इति उक्तं च

अन्यापोहेन अतद्धर्माध्यारोपेण च ॥ २१ ॥

तस्य एव पुनः साक्षाद् निर्देशः क्रियते—