अध्याय 13 - श्लोक 22

तद् एतद् आह कारणं हेतुः गुणसङ्गो गुणेषु ।
उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः ।
परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः ॥ २२ ॥

tad etad āha kāraṇaṃ hetuḥ guṇasaṅgo guṇeṣu .
upadraṣṭānumantā ca bhartā bhoktā maheśvaraḥ .
paramātmeti cāpyukto dehe’sminpuruṣaḥ paraḥ .. 22 ..


(यह आत्मा) उपद्रष्टा है अर्थात् स्वयं क्रिया न करता हुआ पास में स्थित होकर देखनेवाला है। जैसे कोई यज्ञविद्या में कुशल अन्य पुरुष स्वयं यज्ञ न करता हुआ, यज्ञकर्म में लगे हुए पुरोहित

और यजमानों द्वारा किये हुए कर्मसम्बन्धी गुण-दोषों को तटस्थभाव से देखता है, उसी प्रकार कार्य और करणों के व्यापार में स्वयं न लगा हुआ उनसे अन्य—विलक्षण आत्मा उन व्यापारयुक्त कार्य और करणों को समीपस्थभाव से देखनेवाला है।

अथवा देह, चक्षु, मन, बुद्धि और आत्मा—ये सभी द्रष्टा हैं, उनमें बाह्य द्रष्टा शरीर है और उससे लेकर उन सबकी अपेक्षा अन्तरतम—समीपस्थ द्रष्टा अन्तरात्मा है। जिसकी अपेक्षा और कोई आन्तरिक द्रष्टा न हो, वह अतिशय सामीप्यभाव से देखनेवाला होनेके कारण उपद्रष्टा होता है (अत: आत्मा उपद्रष्टा है)।

अथवा (यों समझो कि) यज्ञ के उपद्रष्टा की भाँति सबका अनुभव करनेवाला होने से आत्मा उपद्रष्टा है।

तथा यह अनुमन्ता है—क्रिया करने में लगे हुए अन्त:करण और इन्द्रियादि की क्रियाओंमें संतोषरूप अनुमोदनका नाम अनुमनन है, उसका करनेवाला है।

अथवा यह इसीलिये अनुमन्ता है कि कार्यकरण की प्रवृत्ति में स्वयं प्रवृत्त न होता हुआ भी उनके अनुकूल प्रवृत्त हुआ-सा दीखता है।

अथवा अपने व्यापारमें लगे हुए अन्त:करण और इन्द्रियादि को उनका साक्षी होकर भी कभी निवारण नहीं करता, इसलिये अनुमन्ता है।

तथा यह भर्ता है, चैतन्यस्वरूप आत्मा के भोग और अपवर्ग की सिद्धि के निमित्त से संहत हुए चैतन्य के आभासरूप शरीर, इन्द्रिय, मन और बुद्धि आदिका स्वरूप धारण करना भी भरण है और वह चैतन्यरूप आत्मा का ही किया हुआ है, इसलिये आत्मा को भर्ता कहते हैं।

आत्मा भोक्ता है। अग्नि के उष्णत्व की भाँति नित्य-चैतन्य आत्मसत्ता से समस्त विषयों में पृथक्-पृथक् होनेवाली जो बुद्धिकी सुख-दुःख और मोहरूप प्रतीतियाँ हैं, वे सब चैतन्य आत्मा द्वारा ग्रस्त की हुई-सी दीखती हैं, अतः आत्मा को भोक्ता कहा जाता है।

आत्मा महेश्वर है। वह सबका आत्मा होने के कारण और स्वतन्त्र होने के कारण महान् ईश्वर है, इसलिये महेश्वर है।

वह परमात्मा है। अविद्या द्वारा प्रत्यक् आत्मारूप माने हुए जो शरीर से लेकर बुद्धिपर्यन्त (आत्मशब्दवाच्य पदार्थ) हैं। उन सबसे उपद्रष्टा आदि लक्षणोंवाला आत्मा परम (श्रेष्ठ) है—इसलिये वह परमात्मा है।

श्रुति में भी ‘वह भीतर व्यापक परमात्मा है’ इन शब्दों से उसका वर्णन किया गया है।

ऐसा आत्मा कहाँ है; वह अव्यक्त से पर पुरुष इसी शरीर में है जो कि ‘उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः’ इस प्रकार आगे कहा जायगा और जो ‘क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि’ इस प्रकार पहले कहा जा चुका है तथा जिसकी व्याख्या करके उपसंहार किया गया है ॥ २२ ॥

इस प्रकार उस उपर्युक्त लक्षणों से युक्त आत्मा को—

तात्पर्य पढ़ें

उपद्रष्टा समीपस्थः सन् द्रष्टा स्वयम् अव्यापृतो

यथा ऋत्विग्यजमानेषु यज्ञकर्मव्यापृतेषु

तटस्थः अन्यः अव्यापृतो यज्ञविद्याकुशलः

ऋत्विग्यजमानव्यापारगुणदोषाणाम् ईक्षिता तद्वत् कार्यकरणव्यापारेषु अव्यापृतः अन्यो विलक्षणः तेषां कार्यकरणानां सव्यापाराणां सामीप्येन द्रष्टा उपद्रष्टा ।

अथवा देहचक्षुर्मनोबुद्ध्यात्मानो द्रष्टारः, तेषां बाह्यो द्रष्टा देहः, तत आरभ्य अन्तरतमः च प्रत्यक्समीप आत्मा द्रष्टा यतः परो अन्तरो न अस्ति द्रष्टा स अतिशयसामीप्येन द्रष्टृत्वाद् उपद्रष्टा स्यात्।

यज्ञोपद्रष्टृवद् वा सर्वविषयीकरणाद् उपद्रष्टा ।

अनुमन्ता च अनुमोदनम् अनुमननं कुर्वत्सु

तत्क्रियासु परितोषः तत्कर्ता अनुमन्ता च ।

अथवा अनुमन्ता कार्यकरणप्रवृत्तिषु स्वयम् अप्रवृत्तः अपि प्रवृत्त इव तदनुकूलो विभाव्यते तेन अनुमन्ता।

अथवा प्रवृत्तान् स्वव्यापारेषु तत्साक्षिभूतः

कदाचिद् अपि न निवारयति इति अनुमन्ता ।

भर्ता भरणं नाम देहेन्द्रियमनोबुद्धीनां संहतानां चैतन्यात्मपारार्थ्येन निमित्तभूतेन चैतन्याभासानां यत् स्वरूपधारणं तत् चैतन्यात्मकृतम् एव इति भर्ता आत्मा इति उच्यते।

भोक्ता अग्न्युष्णवद् नित्यचैतन्यस्वरूपेण बुद्धेः सुखदुःखमोहात्मकाः प्रत्ययाः सर्वविषय-विषयाः चैतन्यात्मग्रस्ता इव जायमाना विभक्ता विभाव्यन्ते इति भोक्ता आत्मा उच्यते।

महेश्वरः सर्वात्मत्वात् स्वतन्त्रत्वात् च महान्

ईश्वरः च इति महेश्वरः ।

परमात्मा देहादीनां बुद्ध्यन्तानां प्रत्यगात्म-

त्वेन कल्पितानाम् अविद्यया परम उपद्रष्ट्- त्वादिलक्षण आत्मा इति परमात्मा ।

‘सोऽन्तः परमात्मा’ इति अनेन शब्देन च अपि उक्तः कथितः श्रुतौ।

क्र असौ, अस्मिन् देहे पुरुषः परः अव्यक्तात्।

‘उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः’ इति यो

वक्ष्यमाणः ‘क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि’ इति उपन्यस्तो

व्याख्याय उपसंहृतः च ॥ २२ ॥

तम् एवं यथोक्तलक्षणम् आत्मानम्—