अध्याय 13 - श्लोक 23

य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह
सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते ॥ २३ ॥

ya evaṃ vetti puruṣaṃ prakṛtiṃ ca guṇaiḥ saha
sarvathā vartamāno’pi na sa bhūyo’bhijāyate .. 23 ..


उस पुरुषको जो मनुष्य उपर्युक्त प्रकारसे अर्थात् साक्षात् आत्मभावसे कि ‘यही मैं हूँ’ इस प्रकार जानता है और उपर्युक्त अविद्यारूप प्रकृतिको भी, अपने विकाररूप गुणोंके सहित, विद्याद्वारा निवृत्त की हुई—अभावको प्राप्त की हुई जानता है।

वह सब प्रकारसे वर्तता हुआ भी, इस विद्वत्-शरीरके नाश होनेपर फिर दूसरे शरीरमें जन्म नहीं लेता अर्थात् दूसरे शरीरको ग्रहण नहीं करता।

‘अपि’ शब्दसे यह अभिप्राय है कि अपने वर्णाश्रमधर्मके अनुकूल वर्तनेवाला पुनः उत्पन्न नहीं होता, इसमें तो कहना ही क्या है ?

पू०—यद्यपि ज्ञान उत्पन्न होनेके पश्चात् पुनर्जन्मका अभाव बतलाया गया है, तथापि ज्ञान उत्पन्न होनेसे पहले किये हुए, ज्ञानोत्पत्तिके पश्चात् किये जानेवाले और अनेक भूतपूर्व जन्मोंमें किये हुए जो कर्म हैं, फल प्रदान किये बिना उनका नाश मानना युक्तियुक्त नहीं है, अतः (ज्ञान प्राप्त होनेके बाद भी) तीन जन्म और होने चाहिये।

अभिप्राय यह है कि सभी कर्म समान हैं, उनमें कोई भेद प्रतीत नहीं होता, अतः फल देनेके लिये प्रवृत्त हुए जन्मारम्भ करनेवाले प्रारब्ध कर्मोंके समान ही किये हुए अन्य कर्मोंका भी (बिना फल दिये) नाश (मानना) उचित नहीं, सुतरां तीनों प्रकारके कर्म तीन जन्मोंका आरम्भ करेंगे अथवा सब मिलकर एक जन्मका ही आरम्भ करेंगे (ऐसा मानना चाहिये)।

नहीं तो किये हुए कर्मोंका (बिना फल दिये) नाश माननेसे, सर्वत्र अविश्वासका प्रसंग आ जायगा और शास्त्रकी व्यर्थता सिद्ध हो जायगी। अतः यह कहना कि ‘वह फिर जन्म नहीं लेता’ ठीक नहीं है।

उ०—यह बात नहीं; क्योंकि ‘इसके समस्त कर्म क्षय हो जाते हैं’ ‘ब्रह्मको जाननेवाला ब्रह्म ही हो जाता है’ ‘उसके (मोक्षमें) तभीतककी देर है’ ‘अग्निमें तृणके अग्रभागकी भाँति उसके समस्त कर्म भस्म हो जाते हैं’ इत्यादि सैकड़ों श्रुतियोंद्वारा विद्वान्के सब कर्मोंका दाह होना कहा गया है।

यहाँ गीताशास्त्रमें भी ‘यथैधांसि’ इत्यादि श्लोकमें समस्त कर्मोंका दाह कहा गया है और आगे भी कहेंगे।

युक्तिसे भी यही बात सिद्ध होती है; क्योंकि अविद्या, कामना आदि क्लेशरूप बीजोंसे युक्त हुए ही कारणरूप कर्म अन्य जन्मरूप अंकुरका आरम्भ किया करते हैं।

यहाँ गीताशास्त्रमें भी भगवान्ने जगह-जगह कहा है कि अहंकार और फलाकाङ्क्षायुक्त कर्म ही फलका आरम्भ करनेवाले होते हैं, अन्य नहीं।

तथा ‘जैसे अग्निमें दग्ध हुए बीज फिर नहीं उगते, वैसे ही ज्ञानसे दग्ध हुए क्लेशोंद्वारा आत्मा पुनः शरीर ग्रहण नहीं करता’ ऐसा भी (शास्त्रोंका वचन है)।

पू०—ज्ञान होनेके पश्चात् किये हुए कर्मोंका ज्ञानद्वारा दाह हो सकता है; क्योंकि वे ज्ञानके साथ होते हैं। परंतु इस जन्ममें ज्ञान उत्पन्न होनेसे पहले किये हुए और भूतपूर्व अनेक जन्मोंमें किये हुए कर्मोंका, ज्ञानद्वारा नाश मानना उचित नहीं।

उ०—यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि ‘सारे कर्म (दग्ध हो जाते हैं)’ ऐसा विशेषण दिया गया है।

पू०—यदि ऐसा मानें कि ज्ञानके पश्चात् होनेवाले सब कर्मोंका ही (ज्ञानद्वारा दाह होता है तो?)

उ०—यह बात नहीं है। क्योंकि (इस प्रकारके) संकोचका (कोई) कारण नहीं सिद्ध होता। तुमने जो कहा कि जैसे ज्ञान हो जानेपर भी, वर्तमान जन्मका आरम्भ करनेवाले, फल देनेके लिये प्रवृत्त हुए प्रारब्धकर्म नष्ट नहीं होते, वैसे ही जिनका फल आरम्भ नहीं हुआ है, उन कर्मोंका भी नाश (मानना) युक्तियुक्त नहीं है, सो ऐसा कहना भी ठीक नहीं।

क्योंकि वे प्रारब्धकर्म छोड़े हुए बाणकी भाँति फल देनेके लिये प्रवृत्त हो चुके हैं, इसलिये (उनका फल अवश्य होता है, पर अन्यका नहीं)। जैसे पहले लक्ष्यका वेध करनेके लिये धनुषसे छोड़ा हुआ बाण, लक्ष्यवेध हो जानेके पश्चात् भी आरम्भ हुए वेगका नाश होनेपर गिरकर ही शान्त होता है, वैसे ही शरीरका आरम्भ करनेवाले प्रारब्धकर्म भी, शरीर-स्थितिरूप प्रयोजनके निवृत्त हो जानेपर भी, जबतक संस्कारोंका वेग क्षय नहीं हो जाता, तबतक पहलेकी भाँति वर्तते ही रहते हैं।

वही बाण, जिसका प्रवृत्तिके लिये वेग आरम्भ नहीं हुआ है—जो छोड़ा नहीं गया है, यदि धनुषपर चढ़ा भी लिया गया हो तो भी उसको रोका जा सकता है, वैसे ही जिन कर्मोंके फलका आरम्भ नहीं हुआ है, वे अपने आश्रयमें स्थित हुए ही ज्ञानद्वारा निर्बीज किये जा सकते हैं।

अतः इस विद्वत्-शरीरके गिरनेके पीछे ‘वह फिर उत्पन्न नहीं होता’ यह कहना उचित ही है, यह बात सिद्ध हुई ॥ २३ ॥

यहाँ आत्मदर्शनके विषयमें ये ध्यान आदि भिन्न-भिन्न साधन विकल्पसे कहे जाते हैं—

तात्पर्य पढ़ें

य एवं यथोक्तप्रकारेण वेत्ति पुरुषं साक्षात्

अहम् इति प्रकृतिं च यथोक्ताम् अविद्यालक्षणां

गुणैः स्वविकारैः सह निवर्तिताम् अभावम्

आपादितां विद्या ।

सर्वथा सर्वप्रकारेण वर्तमानः अपि स भूयः पुनः पतिते अस्मिन् विद्वच्छरीरे देहान्तराय न अभिजायते न उत्पद्यते देहान्तरं न गृह्णाति इत्यर्थः।

अपिशब्दात् किमु वक्तव्यं स्ववृत्तस्थो न जायते इति अभिप्रायः ।

ननु यद्यपि ज्ञानोत्पत्त्यनन्तरं पुन- र्जन्माभाव उक्तः तथापि प्राग् ज्ञानोत्पत्तेः कृतानां कर्मणाम् उत्तरकालभाविनां च यानि च अतिक्रान्तानेकजन्मकृतानि तेषां फलम् अदत्त्वा नाशो न युक्त इति स्युः त्रीणि जन्मानि।

कृतविप्रणाशो हि न युक्त इति यथा फले प्रवृत्तानाम् आरब्धजन्मनां कर्मणाम् । न च कर्मणां विशेषः अवगम्यते । तस्मात् त्रिप्रकाराणि अपि कर्माणि त्रीणि जन्मानि आरभेरन् संहतानि वा सर्वाणि एकं जन्म आरभेरन् ।

अन्यथा कृतविनाशे सति सर्वत्र अनाश्वास-प्रसङ्गः शास्त्रानर्थक्यं च स्याद् इति अत इदम् अयुक्तम् उक्तं न स भूयः अभिजायते इति।

न ‘क्षीयन्ते चास्य कर्माणि’ (मु० उ० २। २। ८) ‘ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति’ (मु० उ० ३। २। ९) ‘तस्य तावदेव चिरम्’ (छा० उ० ६। १४। २) ‘इषीकातुलवत् सर्वाणि कर्माणि प्रदूयन्ते’ (छा० उ० ५। २४। ३) इत्यादिश्रुतिशतेभ्यः उक्तो विदुषः सर्वकर्मदाहः।

इह अपि च उक्तः ‘यथैधांसि’ इत्यादिना सर्वकर्मदाहो वक्ष्यति च।

उपपत्तेः च। अविद्याकामक्लेशबीज-निमित्तानि हि कर्माणि जन्मान्तराङ्कुरम् आरभन्ते।

इह अपि च साहंकाराभिसन्धीनि कर्माणि फलारम्भकाणि न इतराणि इति तत्र तत्र भगवता उक्तम्।

‘बीजान्यग्न्युपदग्धानि न रोहन्ति यथा पुनः । ज्ञानदग्धस्तथा क्लेशैर्नात्मा सम्पद्यते पुनः ’—इति च ।

अस्तु तावद् ज्ञानोत्पत्त्युत्तरकालकृतानां कर्मणां ज्ञानेन दाहो ज्ञानसहभावित्वात् । न तु इह जन्मनि ज्ञानोत्पत्तेः प्राक्कृतानाम् अतीतानेकजन्मान्तरकृतानां च दाहो युक्तः ।

न, ‘सर्वकर्माणि’ इति विशेषणात्।

ज्ञानोत्तरकालभाविनाम् एव सर्वकर्मणाम् इति चेत्।

न, सङ्कोचे कारणानुपपत्तेः। यत् तु उक्तं यथा वर्तमानजन्मारम्भकाणि कर्माणि न क्षीयन्ते फलदानाय प्रवृत्तानि एव सति अपि ज्ञाने, तथा अनारब्धफलानाम् अपि कर्मणा क्षयो न युक्त इति। तद् असत्।

कथम्, तेषां मुक्तेषुवत् प्रवृत्तफलत्वात्। यथा पूर्वं लक्ष्यवेधाय मुक्त इषुः धनुषो लक्ष्यवेधोत्तरकालम् अपि आरब्धवेगक्षयात् पतनेन एव निवर्तते एवं शरीरारम्भकं कर्म शरीरस्थितिप्रयोजने निवृत्ते अपि आसंस्कार-वेगक्षयात् पूर्ववद् वर्तते एव।

स एव इषुः प्रवृत्तिनिमित्तानारब्धवेगः तु अमुक्तो धनुषि प्रयुक्तः अपि उपसंह्रियते तथा अनारब्धफलानि कर्माणि स्वाश्रयस्थानि एव ज्ञानेन निर्बीजीक्रियन्ते ।

इति पतिते अस्मिन् विद्वच्छरीरे ‘न स भूयोऽभिजायते’ इति युक्तम् एव उक्तम् इति सिद्धम् ॥ २३ ॥

अत्र आत्मदर्शने उपायविकल्पा इमे ध्यानादय उच्यन्ते—