अध्याय 13 - श्लोक 25

अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते ।
तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः ॥ २५ ॥

anye tvevamajānantaḥ śrutvānyebhya upāsate .
te’pi cātitarantyeva mṛtyuṃ śrutiparāyaṇāḥ .. 25 ..


अन्य कई एक साधकजन उपर्युक्त विकल्पों में से किसी एक के भी द्वारा पूर्वोक्त आत्मतत्त्व को न जानते हुए अन्य आचार्यों से सुनकर—उनकी ऐसी आज्ञा पाकर कि ‘तुम इसीका चिन्तन किया करो’ उपासना करते हैं—श्रद्धापूर्वक चिन्तन करते हैं।

वे केवल सुनने के परायण हुए पुरुष भी अर्थात् जिनके मत में श्रवण करना ही मोक्षमार्गसम्बन्धी प्रवृत्ति में परम आश्रय—गति, परम साधन है, ऐसे केवल अन्य आचार्यों के उपदेश को ही प्रमाण माननेवाले, स्वयं विवेकहीन श्रुतिपरायण पुरुष भी मृत्यु को यानी मृत्युयुक्त संसार को निःसन्देह पार कर जाते हैं।

फिर प्रमाण करने में जो स्वतन्त्र हैं वे विवेकी पुरुष मृत्युयुक्त संसार से तर जाते हैं, इसमें तो कहना ही क्या है ? यह अभिप्राय है ॥ २५ ॥

क्षेत्रज्ञ और ईश्वर की एकता विषयक ज्ञान मोक्ष का साधन है, यह बात ‘यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते’ इस वाक्य से कही, परंतु वह ज्ञान किस कारण से मोक्ष का साधन है ? उस कारण को दिखाने के लिये यह श्लोक आरम्भ किया जाता है—

तात्पर्य पढ़ें

अन्ये तु एषु विकल्पेषु अन्यतरेण अपि एवं यथोक्तम् आत्मानम् अजानन्तः अन्येभ्य आचार्येभ्यः श्रुत्वा इदम् एव चिन्तयत इति उक्ता उपासते श्रद्धानाः सन्तः चिन्तयन्ति।

ते अपि च अतितरन्ति एव अतिक्रामन्ति एव मृत्युं मृत्युयुक्तं संसारम् इति एतत्। श्रुतिपरायणाः श्रुतिः श्रवणं परम् अयनं गमनं मोक्षमार्गप्रवृत्तौ परं साधनं येषां ते श्रुतिपरायणाः केवलपरोपदेशप्रमाणाः स्वयं विवेकरहिता इति अभिप्रायः ।

किमु वक्तव्यं प्रमाणं प्रति स्वतन्त्रा विवेकिनो मृत्युम् अतितरन्ति इति अभिप्रायः ॥ २५ ॥

क्षेत्रज्ञ ईश्वर एकत्व विषयं ज्ञानं मोक्ष साधनं ‘यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते’ इति उक्तम् तत् कस्माद् हेतोः इति तद्धेतुप्रदर्शनार्थं श्लोक आरभ्यते—