क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ ॥ २६ ॥
yāvatsañjñāyate kiñcitsattvaṃ sthāvarajaṅgamam .
kṣetrakṣetrajñasaṃyogāttadviddhi bharatarṣabha .. 26 ..
हे भरतश्रेष्ठ! जो कुछ भी वस्तु उत्पन्न होती है, क्या यहाँ समानभावसे वस्तुमात्रका ग्रहण है? इसपर कहते हैं कि जो कुछ स्थावर-जंगम यानी चर और अचर वस्तु उत्पन्न होती है, वह सब क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके संयोगसे ही उत्पन्न होती है, इस प्रकार तू जान।
पू०—इस क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके संयोगसे क्या अभिप्राय है? क्योंकि क्षेत्रज्ञ, आकाशके समान अवयवरहित है, इसलिये उसका क्षेत्रके साथ रस्सीसे घड़ेके सम्बन्धकी भाँति, अवयवोंके संसर्गसे होनेवाला सम्बन्धरूप संयोग नहीं हो सकता। वैसे ही आपसमें एक-दूसरेका कार्य-कारण-भाव न होनेसे सूत और कपड़ेकी भाँति, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका समवाय-सम्बन्धरूप संयोग भी नहीं बन सकता।
उ०—बताया जाता है, (सुनो)। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ, जो कि विषय और विषयी तथा भिन्न स्वभाववाले हैं, उनका, अन्यमें अन्यके धर्मोंका अध्यासरूप संयोग है, यह संयोग रज्जु और सीप आदिमें उनके स्वरूपसम्बन्धी ज्ञानके अभावसे अध्यारोपित सर्प और चाँदी आदिके संयोगकी भाँति, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके वास्तविक स्वरूपको न जाननेके कारण है।
ऐसा यह अध्यासस्वरूप क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका संयोग मिथ्या ज्ञान है।
जो पुरुष शास्त्रोक्त रीतिसे क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके लक्षण और भेदको जानकर पहले जिसका स्वरूप दिखलाया गया है, उस क्षेत्रसे मूँजमेंसे सींक अलग करनेकी भाँति पूर्वोक्त लक्षणोंसे युक्त क्षेत्रज्ञको अलग करके देखता है अर्थात् उस ज्ञेयस्वरूप क्षेत्रज्ञको ‘न सत्तन्नासदुच्यते’ इस वाक्यानुसार समस्त उपाधिरूप विशेषताओंसे अतीत ब्रह्मस्वरूपसे देख लेता है।
तथा जो क्षेत्रको मायासे रचे हुए हाथी, स्वप्नमें देखी हुई वस्तु या गन्धर्वनगर आदिकी भाँति ‘यह वास्तवमें नहीं है तो भी सत्की भाँति प्रतीत होता है’, ऐसे
निश्चयपूर्वक जान लेता है, उसका मिथ्याज्ञान उपर्युक्त यथार्थ ज्ञानसे विरुद्ध होनेके कारण नष्ट हो जाता है।
पुनर्जन्मके कारणरूप उस मिथ्याज्ञानका अभाव हो जानेपर ‘य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह’ इस श्लोकसे जो यह कहा गया है कि ‘विद्वान् पुनः उत्पन्न नहीं होता’ सो युक्तियुक्त ही है ॥ २६ ॥
‘न स भूयोऽभिजायते’ इस कथनसे पूर्णज्ञानका फल, अविद्या आदि संसारके बीजोंकी निवृत्तिद्वारा पुनर्जन्मका अभाव बतलाया गया तथा अविद्याजनित क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके संयोगको जन्मका कारण बतलाया गया। इसलिये उस अविद्याको निवृत्ति करनेवाला पूर्ण ज्ञान, यद्यपि पहले कहा जा चुका है तो भी दूसरे शब्दोंमें फिर कहा जाता है—
तात्पर्य पढ़ें
यावद् यत् किञ्चित् सञ्जायते समुत्पद्यते सत्त्वं वस्तु किम् अविशेषेण इति आह स्थावरजङ्गमं स्थावरं जङ्गमं च क्षेत्रक्षेत्रज्ञ- संयोगत् तद् जायते इति एवं विद्धि जानीहि हे भरतर्षभ ।
कः पुनः अयं क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोः संयोगः अभिप्रेतः । न तावद् रज्ज्वा इव घटस्य अवयवसंश्लेष-द्वारकः सम्बन्धविशेषः संयोगः क्षेत्रेण क्षेत्रज्ञस्य सम्भवति आकाशवद् निरवयवत्वात् । न अपि समवायलक्षणः तन्तुपटयोः इव क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोः इतरेतरकार्यकारणभावानभ्युपगमाद् इति ।
उच्यते, क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोः विषयविषयिणोः भिन्नस्वभावयोः इतरेतरतद्धर्माध्यासलक्षणः संयोगः क्षेत्रक्षेत्रज्ञस्वरूपविवेकाभावनिबन्धनः । रज्जुशुक्तिकादीनां तद्विवेकज्ञानाभावाद् अध्यारोपितसर्परजतादिसंयोगवत् ।
सः अयम् अध्यासस्वरूपः क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगो मिथ्याज्ञानलक्षणः ।
यथाशास्त्र क्षेत्रक्षेत्रज्ञलक्षणभेदपरिज्ञानपूर्वकं प्राग्दर्शितरूपात् क्षेत्राद् मुञ्चाद् एव इषीकां यथोक्तलक्षणं क्षेत्रज्ञ प्रविभज्य ‘न सत्तत्रासदुच्यते’ इत्यनेन निरस्तसर्वोपाधिविशेषं ज्ञेयं ब्रह्मस्वरूपेण यः पश्यति।
क्षेत्रं च मायानिर्मितहस्तिस्वप्नदृष्टवस्तु-गन्धर्वनगरादिवद् असद् एव सद् इव
अवभासते इति एवं निश्चितविज्ञानो यः तस्य यथोक्तसम्यग्दर्शनविरोधाद् अपगच्छति मिथ्याज्ञानम् ।
तस्य जन्महेतोः अपगमात्; ‘य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह’ इत्यनेन विद्वान् भूयो न अभिजायते इति यद् उक्तं तद् उपपन्नम् उक्तम् ॥ २६ ॥
‘न स भूयोऽभिजायते’ इति सम्यग्दर्शन-फलम् अविद्यादिसंसारबीजनिवृत्तिद्वारेण जन्माभाव उक्तः । जन्मकारणं च अविद्यानिमित्तकः क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोग उक्तः । अतः तस्या अविद्याया निवर्तकं सम्यग्दर्शनम् उक्तम् अपि पुनः शब्दान्तरेण उच्यते—