अध्याय 13 - श्लोक 27

समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् ।
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ॥ २७ ॥

samaṃ sarveṣu bhūteṣu tiṣṭhantaṃ parameśvaram .
vinaśyatsvavinaśyantaṃ yaḥ paśyati sa paśyati .. 27 ..


(जो पुरुष) ब्रह्मा से लेकर स्थावरपर्यन्त समस्त प्राणियों में समभाव से स्थित—(व्याप्त) हुए परमेश्वर को अर्थात् शरीर, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, अव्यक्त और आत्मा की अपेक्षा जो परम ईश्वर है, उस परमेश्वर को सब भूतों में समभाव से स्थित देखता है।

यहाँ भूतों से परमेश्वर की अत्यन्त विलक्षणता दिखलाने के निमित्त भूतों के लिये विनाशशील और परमेश्वर के लिये अविनाशी विशेषण देते हैं।

पू०—इससे परमेश्वर की विलक्षणता कैसे सिद्ध होती है?

उ०—सभी भावविकारों का जन्मरूप, भावविकार मूल है। अन्य सब भावविकार जन्म के पीछे होनेवाले और विनाश में समाप्त होनेवाले हैं। भाव का अभाव हो जाने के कारण विनाश के पश्चात् कोई भी भावविकार नहीं रहता, क्योंकि धर्मी के रहते ही धर्म रहते हैं।

इसलिये अन्तिम भाव-विकार के अभाव का (‘अविनश्यन्तम्’ इस पद के द्वारा) अनुवाद करने से पहले होनेवाले सभी भाव-विकारों का कार्य के सहित प्रतिषेध हो जाता है।

सुतरां (उपर्युक्त वर्णन से) परमेश्वर की सब भूतों से अत्यन्त ही विलक्षणता तथा निर्विशेषता और एकता भी सिद्ध होती है। अतः जो इस प्रकार उपर्युक्त भाव से परमेश्वर को देखता है वही देखता है।

पू०—सभी लोग देखते हैं फिर ‘वही देखता है’ इस विशेषण से क्या प्रयोजन है?

उ०—ठीक है, (अन्य सब भी) देखते हैं परंतु विपरीत देखते हैं, इसलिये वह विशेषण दिया गया है कि वही देखता है।

जैसे कोई तिमिर-रोग से दूषित हुई दृष्टिवाला अनेक चन्द्रमाओं को देखता है, उसकी अपेक्षा एक चन्द्र देखनेवाले की यह विशेषता बतलायी जाती है कि वही ठीक देखता है। वैसे ही यहाँ भी जो आत्मा को उपर्युक्त प्रकार से विभागरहित एक देखता है, उसकी अलग-अलग अनेक आत्मा देखनेवाले विपरीतदर्शियों की अपेक्षा यह विशेषता बतलायी जाती है कि वही ठीक-ठीक देखता है।

अभिप्राय यह है कि दूसरे सब अनेक चन्द्र देखनेवाले की भाँति विपरीत भाव से देखनेवाले होने के कारण, देखते हुए भी वास्तव में नहीं देखते ॥ २७ ॥

उपर्युक्त यथार्थ ज्ञान का फल बतलाकर उसकी स्तुति करनी चाहिये। इसलिये यह श्लोक आरम्भ किया जाता है—

तात्पर्य पढ़ें

समं निर्विशेषं तिष्ठन्तं स्थितिं कुर्वन्तं क्व सर्वेषु भूतेषु ब्रह्मादिस्थावरान्तेषु प्राणिषु कं परमेश्वरं देहेन्द्रियमनोबुद्ध्यव्यक्तात्मनः अपेक्ष्य परमेश्वरः तं सर्वेषु भूतेषु समं तिष्ठन्तम्।

तानि विशिनष्टि विनश्यत्सु इति। तं च परमेश्वरम् अविनश्यन्तम् इति भूतानां परमेश्वरस्य च अत्यन्तवैलक्षण्यप्रदर्शनार्थम् ।

सर्वेषां हि भावविकाराणां जनिलक्षणो भावविकारो मूलम्, जन्मोत्तरभाविनः अन्ये सर्वे भावविकारा विनाशान्ताः । विनाशात्परो न कश्चिद् अस्ति भावविकारो भावाभावात् सति हि धर्मिणि धर्मा भवन्ति ।

अतः अन्त्यभावविकाराभावानुवादेन पूर्व-भाविनः सर्वे भावविकाराः प्रतिषिद्धा भवन्ति सह कार्यैः।

तस्मात् सर्वभूतैः वैलक्षण्यम् अत्यन्तम् एव परमेश्वरस्य सिद्धं निर्विशेषत्वम् एकत्वं च । य एवं यथोक्तम् परमेश्वरं पश्यति स पश्यति ।

ननु सर्वः अपि लोकः पश्यति किं विशेषणेन इति।

सत्यं पश्यति किं तु विपरीतं पश्यति अतो

विशिनष्टि स एव पश्यति इति।

यथा तिमिरदृष्टिः अनेकं चन्द्रं पश्यति तम् अपेक्ष्य एकचन्द्रदर्शी विशिष्यते स एव पश्यति इति, तथा एव इह अपि एकम् अविभक्तं यथोक्तम् आत्मानं यः पश्यति स विभक्ताने-कात्मविपरीतदर्शिभ्यो विशिष्यते, स एव पश्यति इति।

इतरे पश्यन्तः अपि न पश्यन्ति विपरीत-दर्शित्वाद् अनेकचन्द्रदर्शिवद् इत्यर्थः ॥ २७ ॥

यथोक्तस्य सम्यग्दर्शनस्य फलवचनेन स्तुतिः कर्तव्या इति श्लोक आरभ्यते—