अध्याय 13 - श्लोक 28

कथम्—
समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् ।
न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम् ॥ २८ ॥

katham—
samaṃ paśyanhi sarvatra samavasthitamīśvaram .
na hinastyātmanātmānaṃ tato yāti parāṃ gatim .. 28 ..


क्योंकि सर्वत्र—सब भूतोंमें समभाव से स्थित हुए ईश्वरको अर्थात् ऊपरके श्लोकमें जिसके लक्षण बतलाये गये हैं, उस (परमेश्वर)-को सर्वत्र समान भावसे देखनेवाला पुरुष स्वयं—अपने-आप अपनी हिंसा नहीं करता, इसलिये अर्थात् अपनी हिंसा न करनेके कारण वह मोक्षरूप परम उत्तम गतिको प्राप्त होता है।

पू०—कोई भी प्राणी स्वयं अपनी हिंसा नहीं करता फिर यह अप्राप्तका निषेध क्यों किया जाता है कि ‘वह अपनी हिंसा नहीं करता; जैसे कोई कहे कि पृथ्वीपर और अन्तरिक्षमें अग्नि नहीं जलानी चाहिये*।’

> यहाँ पृथ्वीपर अग्नि जलानेका निषेध करना तो इसलिये अयुक्त है कि यदि पृथ्वीपर अग्नि न जलायी जाय तो कहाँ जलायी जाय? और अन्तरिक्षमें जलानेका निषेध इसलिये ठीक नहीं कि वहाँ तो वह जलायी ही नहीं जा सकती।

उ०—यह दोष नहीं है; क्योंकि अज्ञानियों से स्वयं अपना तिरस्कार करना बन सकता है। सभी अज्ञानी अत्यन्त प्रसिद्ध साक्षात्—प्रत्यक्ष आत्माका तिरस्कार करके अनात्मा शरीरादि को आत्मा मानकर, फिर धर्म और अधर्मका आचरण कर, उस प्राप्त किये हुए (शरीररूप) आत्माका नाश करके दूसरे नये (शरीररूप) आत्माको प्राप्त करते हैं। फिर उसका भी इसी प्रकार नाश करके अन्यको और उसका भी वैसे ही नाश करके (पुनः) अन्यको पाते रहते हैं। इस प्रकार बारंबार शरीररूप आत्माको प्राप्त करके उसकी हिंसा करते जाते हैं, अतः सभी अज्ञानी आत्महत्यारे हैं।

जो वास्तवमें आत्मा है वह भी अविद्याद्वारा (अज्ञात होनेके कारण) सदा मारा हुआ-सा ही रहता है; क्योंकि उनके लिये उसका विद्यमान फल भी नहीं होता। सुतरां सभी अविद्वान् आत्मा की हिंसा करनेवाले ही हैं।

परंतु जो इनसे अन्य उपर्युक्त आत्मस्वरूपको जाननेवाला है, वह दोनों प्रकारसे ही अपने द्वारा अपना नाश नहीं करता है। इस लिये वह परमगति प्राप्त कर लेता है अर्थात् उसे पहले बताया हुआ (परम गतिरूप) फल प्राप्त होता है॥ २८॥

यह जो कहा कि ईश्वरको सब भूतोंमें सम भावसे स्थित देखता हुआ पुरुष, आत्माद्वारा आत्माका नाश नहीं करता, यह युक्तिसङ्गत नहीं है; क्योंकि अपने गुण और कर्मों की विलक्षणतासे विभिन्न हुए जीवोंमें इस प्रकार देखना नहीं बन सकता, ऐसी शंका करके कहते हैं—

तात्पर्य पढ़ें

समं पश्यन् उपलभमानो हि यस्मात् सर्वत्र सर्वभूतेषु समवस्थितं तुल्यतया अवस्थितम् ईश्वरम् अतीतानन्तरश्लोकोक्तलक्षणम् इत्यर्थः। समं पश्यन् किं न हिनस्ति हिंसां न करोति आत्मना स्वेन एव स्वम् आत्मानं ततः तद् अहिंसनाद् याति परां प्रकृष्टां गतिं मोक्षाख्याम्।

ननु न एव कश्चित् प्राणी स्वयं स्वम् आत्मानं हिनस्ति कथम् उच्यते अप्राप्तं न हिनस्ति इति। यथा न पृथिव्याम् अग्निः चेतव्यो न अन्तरिक्षे इत्यादि।

न एष दोषः अज्ञानाम् आत्मतिरस्कर-णोपपत्तेः। सर्वो हि अज्ञः अत्यन्तप्रसिद्धं साक्षाद् अपरोक्षाद् आत्मानं तिरस्कृत्य अनात्मानम् आत्मत्वेन परिगृह्य तम् अपि धर्माधर्मौ कृत्वा उपात्तम् आत्मानं हत्वा, अन्यम् आत्मानम् उपादत्ते नवम्, तं च एवं हत्वा अन्यम्, एवं तम् अपि हत्वा अन्यम् इति एवम् उपात्तम् उपात्तम् आत्मानं हन्ति इति आत्महा सर्वः अज्ञः।

यः तु परमार्थात्मा असौ अपि सर्वदा अविद्यया हत इव विद्यमानफलाभावाद् इति सर्वे आत्महन एव अविद्वांसः।

यः तु इतरो यथोक्तात्मदर्शी स उभयथा अपि आत्मना आत्मानं न हिनस्ति ततो याति परां गतिं यथोक्तं फलं तस्य भवति इत्यर्थः॥ २८॥

सर्वभूतस्थम् ईशं समं पश्यन् न हिनस्ति आत्मना आत्मानम् इति उक्तं तद् अनुपपन्नं स्वगुणकर्मवैलक्षण्यभेदभिन्नेषु आत्मसु इति एतद् आशङ्क्य आह—