अध्याय 13 - श्लोक 29

प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः ।
यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति ॥ २९ ॥

prakṛtyaiva ca karmāṇi kriyamāṇāni sarvaśaḥ .
yaḥ paśyati tathātmānamakartāraṃ sa paśyati .. 29 ..


‘मायाको प्रकृति समझना चाहिये’ इत्यादि मन्त्रों के अनुसार भगवान् की त्रिगुणात्मिका माया का नाम प्रकृति है, जो कि महत्तत्त्व आदि कार्य-करण के आकार में परिणत है; उस प्रकृति द्वारा ही मन, वाणी और शरीर से होनेवाले सारे कर्म, सब प्रकार से सम्पादन किये जाते हैं; अन्य किसी से नहीं, इस प्रकार जो देखता है।

तथा आत्मा को—क्षेत्रज्ञ को जो समस्त उपाधियों से रहित अकर्ता देखता है, वही देखता है अर्थात् वही परमार्थदर्शी है; क्योंकि आकाश की भाँति निर्गुण और विशेषतारहित अकर्ता आत्मा में, भेदभाव का होना प्रमाणित नहीं हो सकता। यह अभिप्राय है ॥ २९ ॥

फिर भी, उसी यथार्थ ज्ञान की दूसरे शब्दों से व्याख्या करते हैं—

तात्पर्य पढ़ें

प्रकृत्या प्रकृतिः भगवतो माया त्रिगुणात्मिका, ‘मायां तु प्रकृतिं विद्यात्’ (श्वे० उ० ४। १०) इति मन्त्रवर्णात् तया प्रकृत्या एव च न अन्येन महदादिकार्यकरणाकारपरिणतया कर्माणि वाङ्मनःकायारभ्याणि क्रियमाणानि निर्वर्त्यमानानि सर्वशः सर्वप्रकारैः यः पश्यति उपलभते।

तथा आत्मानं क्षेत्रज्ञम् अकर्तारं सर्वोपाधि-विवर्जितं पश्यति स परमार्थदर्शी इति अभिप्रायः । निर्गुणस्य अकर्तुः निर्विशेषस्य आकाशस्य इव भेदे प्रमाणानुपपत्तिः इत्यर्थः ॥ २९ ॥

पुनरपि तद् एव सम्यग्दर्शनं शब्दान्तरेण प्रपञ्चयति—