अध्याय 13 - श्लोक 3

कथम्—
तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत् ।
स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु ॥ ३ ॥

katham—
tatkṣetraṃ yacca yādṛkca yadvikāri yataśca yat .
sa ca yo yatprabhāvaśca tatsamāsena me śṛṇu .. 3 ..


जिसका पहले ‘इदं शरीरम्’ इत्यादि (वाक्य) से वर्णन किया गया है, यहाँ ‘तत्’ शब्द से उसीका संकेत करते हैं।

यह जो पूर्वोक्त क्षेत्र है वह जैसा है अर्थात् अपने धर्मोंके कारण वह जिस प्रकारका है तथा जैसे विकारोंवाला है और जिस कारणसे जो कार्य उत्पन्न होता है—यहाँ ‘च’ शब्द समुच्चयके लिये है; और ‘कार्य उत्पन्न होता है’ यह वाक्यशेष है।

तथा जिसे क्षेत्रज्ञ कहा गया है वह भी जिस प्रभाववाला अर्थात् जिन-जिन उपाधिकृत शक्तियोंवाला है, उन क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ दोनोंका उपर्युक्त विशेषणोंसे युक्त यथार्थ स्वरूप तू मुझसे संक्षेपसे सुन अर्थात् सुनकर निश्चय कर ॥ ३ ॥

श्रोताकी बुद्धिमें रुचि उत्पन्न करनेके लिये, उस कहे जानेवाले क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके यथार्थ स्वरूपकी स्तुति करते हैं—

तात्पर्य पढ़ें

यद् निर्दिष्टम् इदं शरीरम् इति तत्

तच्छब्देन परामृशति ।

यत् च इदं निर्दिष्टं क्षेत्रं तद् यादृग् यादृशं स्वकीयैः धर्मैः । च शब्दः समुच्चयार्थो यद्विकारि यो विकारः अस्य तद् यद्विकारि यतो यस्मात् च यत् कार्यम् उत्पद्यते इति वाक्यशेषः ।

स च यः क्षेत्रज्ञो निर्दिष्टः स यत्प्रभावो ये प्रभावा उपाधिकृताः शक्तयो यस्य स यत्प्रभावः च । तत् क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोः याथात्म्यं यथाविशेषितं समासेन सङ्क्षेपेण मे मम वाक्यतः शृणु श्रुत्वा अवधारय इत्यर्थः ॥ ३ ॥

तत् क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोः याथात्म्यं विवक्षितं स्तौति श्रोतृबुद्धिप्ररोचनार्थम् ।