अध्याय 13 - श्लोक 31

अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः ।
शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ॥ ३१ ॥

anāditvānnirguṇatvātparamātmāyamavyayaḥ .
śarīrastho’pi kaunteya na karoti na lipyate .. 31 ..


आदि कारणको कहते हैं, जिसका कोई कारण न हो, उसका नाम अनादि है और अनादिके भावका नाम अनादित्व है यह परमात्मा अनादि होनेके कारण अव्यय है; क्योंकि जो वस्तु आदिमान् होती है, वही अपने स्वरूपसे क्षीण होती है। किंतु यह परमात्मा अनादि है, इसलिये अवयवरहित है। अतः इसका क्षय नहीं होता।

तथा निर्गुण होनेके कारण भी यह अव्यय है; क्योंकि जो वस्तु गुणयुक्त होती है, उसका गुणोंके क्षयसे क्षय होता है। परंतु यह (आत्मा) गुणरहित है, अत: इसका क्षय नहीं होता। सुतरां यह परमात्मा अव्यय है, अर्थात् इसका व्यय नहीं होता।

ऐसा होनेके कारण यह आत्मा शरीरमें स्थित हुआ भी—शरीरमें रहता हुआ भी कुछ नहीं करता है, तथा कुछ न करनेके कारण ही उसके फलसे भी लिप्त नहीं होता है। आत्माकी शरीरमें प्रतीति होती है, इसलिये शरीरमें स्थित कहा जाता है।

क्योंकि जो कर्ता होता है वही कर्मोंके फलसे लिप्त होता है। परंतु यह अकर्ता है, इसलिये फलसे लिप्त नहीं होता, यह अभिप्राय है।

पू०—तो फिर शरीरोंमें ऐसा कौन है जो कर्म करता है और उसके फलसे लिप्त होता है ? यदि यह मान लिया जाय कि परमात्मासे भिन्न कोई शरीरी कर्म करता है और उसके फलसे लिप्त होता है तब तो ‘क्षेत्रज्ञ भी तू मुझे ही जान’ इस प्रकार जो क्षेत्रज्ञ और ईश्वरकी एकता कही है, वह अयुक्त ठहरेगी।

यदि यह माना जाय कि ईश्वरसे पृथक् अन्य कोई शरीरी नहीं है तो यह बतलाना चाहिये, फिर कौन करता और लिप्त होता है ? अथवा यह कह देना चाहिये कि (इन सबसे) पर कोई ईश्वर ही नहीं है।

(बात तो यह है कि) भगवान्द्वारा कहा हुआ यह उपनिषद्रूप दर्शन सर्वथा दुर्विज्ञेय और दुर्वाच्य है, इसीलिये वैशेषिक, सांख्य, जैन और बौद्ध-मतावलम्बियोंद्वारा यह छोड़ दिया गया है।

उ०—इसका उत्तर ‘स्वभाव ही वर्तता है’ ऐसा कहकर भगवान्‌ने स्वयं ही दे दिया है; क्योंकि अविद्यामात्र स्वभाववाला ही करता है और लिप्त होता है, इसीसे यह व्यवहार चल रहा है। वास्तवमें अद्वितीय परमात्मामें वे (‘कर्तापन’ और ‘लिप्त होना’ आदि) नहीं हैं।

सुतरां इस वास्तविक ज्ञानदर्शनमें स्थित हुए ज्ञाननिष्ठ, परमहंस परिव्राजक संन्यासियोंका जिन्होंने अविद्याकृत समस्त व्यवहारका तिरस्कार कर दिया है, कर्मोंमें अधिकार नहीं है—यह बात जगह-जगह भगवान्द्वारा दिखलायी गयी है ॥ ३१ ॥

परमात्मा किसीकी भाँति न करता है और न लिप्त होता है ? इसपर यहाँ दृष्टान्त कहते हैं—

तात्पर्य पढ़ें

अनादित्वाद् अनादेः भावः अनादित्वम् आदिः कारणं तद् यस्य न अस्ति तद् अनादिः। यद् हि आदिमत् तत् स्वेन आत्मना व्येति अयं तु अनादित्वाद् निरवयव इति कृत्वा न व्येति।

तथा निर्गुणत्वात् सगुणो हि गुणव्ययाद् व्येति अयं तु निर्गुणत्वाद् न व्येति इति परमात्मा अयम् अव्ययो न अस्य व्ययो विद्यते इति अव्ययः ।

यत एवम् अतः शरीरस्थः अपि शरीरेषु आत्मन उपलब्धिः भवति इति शरीरस्थ उच्यते तथा न करोति। तदकरणाद् एव तत्फलेन न लिप्यते।

यो हि कर्ता स कर्मफलेन लिप्यते अयं तु

अकर्ता अतो न फलेन लिप्यते इत्यर्थः ।

कः पुनः देहेषु करोति लिप्यते च, यदि

तावद् अन्यः परमात्मनो देही करोति लिप्यते च

तत इदम् अनुपपन्नम् उक्तं क्षेत्रज्ञेश्वरैकत्वम् ‘क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि’ इत्यादि।

अथ न अस्ति ईश्वराद् अन्यो देही कः

करोति लिप्यते च इति वाच्यं परो वा नास्ति इति।

सर्वथा दुर्विज्ञेयं दुर्वाच्यं च इति भगवत्प्रोक्तम्

औपनिषदं दर्शनं परित्यक्तं वैशेषिकैः

साङ्ख्यार्हतबौद्धैः च ।

तत्र अयं परिहारो भगवता स्वेन एव उक्तः

‘स्वभावस्तु प्रवर्तते’ इति। अविद्यामात्रस्वभावो

हि करोति लिप्यते इति व्यवहारो भवति न तु

परमार्थत एकस्मिन् परमात्मनि तद् अस्ति।

अत एतस्मिन् परमार्थसाङ्ख्यदर्शने

स्थितानां ज्ञाननिष्ठानां परमहंसपरिव्राजकानां

तिरस्कृताविद्याव्यवहाराणां कर्माधिकारो न

अस्ति इति तत्र तत्र दर्शितं भगवता ॥ ३१ ॥

किम् इव न करोति न लिप्यते इति अत्र दृष्टान्तम् आह—