अध्याय 13 - श्लोक 33

किं च—
यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः ।
क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत ॥ ३३ ॥

kiṃ ca—
yathā prakāśayatyekaḥ kṛtsnaṃ lokamimaṃ raviḥ .
kṣetraṃ kṣetrī tathā kṛtsnaṃ prakāśayati bhārata .. 33 ..


जैसे एक ही सूर्य इस समस्त लोक को प्रकाशित करता है, वैसे ही महाभूतों से लेकर धृतिपर्यन्त बतलाये हुए समस्त क्षेत्र को वह एक होते हुए भी प्रकाशित करता है। कौन करता है? क्षेत्रज्ञ—परमात्मा।

यहाँ आत्मा में सूर्य का दृष्टान्त दोनों प्रकारसे ही घटता है, आत्मा सूर्य की भाँति समस्त शरीरों में एक है और अलिप्त भी है ॥ ३३ ॥

सारे अध्याय के अर्थ का उपसंहार करनेके लिये यह श्लोक (कहा जाता है)—

तात्पर्य पढ़ें

यथा प्रकाशयति अवभासयति एकः कृत्स्नं लोकम् इमं रविः सविता आदित्यः तथा तद्वद् महाभूतादिधृत्यन्तं क्षेत्रम् एकः सन् प्रकाशयति कः क्षेत्री परमात्मा इत्यर्थः ।

रविदृष्टान्तः अत्र आत्मनः उभयार्थः अपि भवति रविवत् सर्वक्षेत्रेषु एक आत्मा अलेपकः च इति ॥ ३३ ॥

समस्ताध्यायार्थोपसंहारार्थः अयं श्लोकः—

क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं