ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः ॥ ४ ॥
ṛṣibhirbahudhā gītaṃ chandobhirvividhaiḥ pṛthak .
brahmasūtrapadaiścaiva hetumadbhirviniścitaiḥ .. 4 ..
(यह क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका तत्त्व) वसिष्ठादि ऋषियोंद्वारा बहुत प्रकारसे कहा गया है और ऋग्वेदादि नाना प्रकारके श्रुतिवाक्योंद्वारा भी पृथक्-पृथक्—विवेचनपूर्वक कहा गया है।
तथा संशयरहित निश्चित ज्ञान उत्पन्न करनेवाले; विनिश्चित और युक्तियुक्त ब्रह्मसूत्र के पदोंसे भी कहा गया है। जो वाक्य ब्रह्मके सूचक हैं उसका नाम ‘ब्रह्मसूत्र’ है, उनके द्वारा ब्रह्म पाया जाता है—जाना जाता है, इसलिये उनको ‘पद’ कहते हैं, उनसे भी क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका तत्त्व कहा गया है; क्योंकि ‘केवल आत्मा ही सब कुछ है’ ‘ऐसी उपासना करनी चाहिये’ इत्यादि ब्रह्म सूचक पदोंसे ही आत्मा जाना जाता है ॥ ४ ॥
इस प्रकार स्तुति सुनकर सम्मुख हुए अर्जुनसे भगवान् कहते हैं—
तात्पर्य पढ़ें
ऋषिभिः वसिष्ठादिभिः बहुधा बहुप्रकारं गीतं कथितम्, छन्दोभिः छन्दांसि ऋगादीनि तैः छन्दोभिः विविधैः नानाप्रकारैः पृथग् विवेकतो गीतम्।
किं च ब्रह्मसूत्रपदैः च एव, ब्रह्मणः सूचकानि वाक्यानि ब्रह्मसूत्राणि तैः पद्यते गम्यते ज्ञायते ब्रह्म इति तानि पदानि उच्यन्ते। तैः एव च क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोः याथात्म्यं गीतम् इति अनुवर्तते। ‘आत्मेत्येवोपासीत’ (बृह० उ० १। ४। ७) इत्यादिभिः हि ब्रह्मसूत्रपदैः आत्मा ज्ञायते। हेतुमद्भिः युक्तियुक्तैः विनिश्चितैः न संशयरूपैः निश्चितप्रत्ययोत्पादकैः इत्यर्थः ॥ ४ ॥
स्तुत्या अभिमुखीभूताय अर्जुनाय आह—