इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं एतत्क्षेत्रं समासेन
सङ्घातश्चेतना धृतिः ।
सविकारमदाहृतम् ॥ ६ ॥
iti āha bhagavān—
icchā dveṣaḥ sukhaṃ duḥkhaṃ etatkṣetraṃ samāsena
saṅghātaścetanā dhṛtiḥ .
savikāramadāhṛtam .. 6 ..
इच्छा—जिस प्रकारके सुखदायक विषयका पहले उपभोग किया हो, फिर वैसे ही पदार्थके प्राप्त होनेपर उसको सुखका कारण समझकर मनुष्य उसे लेना चाहता है, उस चाहका नाम ‘इच्छा’ है, वह अन्त:करणका धर्म है और ज्ञेय होनेके कारण क्षेत्र है।
तथा द्वेष—जिस प्रकारके पदार्थको दुःखका कारण समझकर पहले अनुभव किया हो, फिर उसी जातिके पदार्थके प्राप्त होनेपर जो उससे मनुष्य द्वेष करता है, उस भावका नाम ‘द्वेष’ है, वह भी ज्ञेय होनेके कारण क्षेत्र ही है।
उसी प्रकार सुख, जो कि अनुकूल, प्रसन्नतारूप और सात्त्विक है, ज्ञेय होनेके कारण क्षेत्र ही है तथा प्रतिकूलतारूप दुःख भी ज्ञेय होनेके कारण क्षेत्र ही है।
देह और इन्द्रियोंका समूह संघात कहलाता है। उसमें प्रकाशित हुई जो अन्तःकरणकी वृत्ति है जो कि ‘अग्निसे प्रज्वलित लोहपिण्डकी भाँति’ आत्मचैतन्यके आभासरूपसे व्याप्त है, वह चेतना भी ज्ञेय होनेके कारण क्षेत्र ही है।
व्याकुल हुए शरीर और इन्द्रियादि जिससे धारण किये जाते हैं, वह धृति भी ज्ञेय होनेसे क्षेत्र ही है।
अन्त:करणके समस्त धर्मोंका संकेत करनेके लिये यहाँ इच्छादि धर्मोंका ग्रहण किया गया है। जो कुछ कहा गया है, उसका उपसंहार करते हैं—
महत्तत्त्वादि विकारोंके सहित क्षेत्रका यह स्वरूप संक्षेपसे कहा गया। अर्थात् जिन समस्त क्षेत्रभेदोंका समूह ‘यह शरीर क्षेत्र है’ ऐसा कहा गया है, महाभूतोंसे लेकर धृतिपर्यन्त भेदोंसे विभिन्न हुए उस क्षेत्रकी व्याख्या कर दी गयी ॥ ६ ॥
जो आगे कहे जानेवाले विशेषणोंसे युक्त क्षेत्रज्ञ है, जिस क्षेत्रज्ञको प्रभावसहित जान लेनेसे (मनुष्य) अमृतरूप हो जाता है, उसको भगवान् स्वयं आगे चलकर ‘ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि’ इत्यादि वचनोंसे विशेषणोंके सहित कहेंगे।
यहाँ पहले उस (क्षेत्रज्ञ)-के जाननेका उपायरूप जो अमानित्व आदि साधनसमुदाय है, जिसके होनेसे उस ज्ञेयको जाननेके लिये मनुष्य योग्य अधिकारी बन जाता है, जिसके परायण हुआ संन्यासी ज्ञाननिष्ठ कहा जाता है और जो ज्ञानका साधन होनेके कारण ज्ञान नामसे पुकारा जाता है, उस अमानित्वादि गुणसमुदायका भगवान् विधान करते हैं—
तात्पर्य पढ़ें
इच्छा यज्जातीयं सुखहेतुम् अर्थम् उपलब्धवान्
पूर्वं पुनः तज्जातीयम् उपलभमानः तम् आदातुम्
इच्छति सुखहेतुः इति सा इयम् इच्छा
अन्तःकरणधर्मो ज्ञेयत्वात् क्षेत्रम्।
तथा द्वेषो यज्जातीयम् अर्थं दुःखहेतुत्वेन
अनुभूतवान् पुनः तज्जातीयम् उपलभमानः
तं द्वेष्टि सः अयं द्वेषो ज्ञेयत्वात् क्षेत्रम् एव ।
तथा सुखम् अनुकूलं प्रसन्नं सत्त्वात्मकं
ज्ञेयत्वात् क्षेत्रम् एव । दुःखं प्रतिकूलात्मकं
ज्ञेयत्वात् तद् अपि क्षेत्रम् ।
सङ्घातो देहेन्द्रियाणां संहतिः तस्याम्
अभिव्यक्ता अन्तःकरणवृत्तिः तप्ते इव
लोहपिण्डे अग्निः आत्मचैतन्याभासरसविद्धा चेतना
सा च क्षेत्रं ज्ञेयत्वात्।
धृतिः यया अवसादप्राप्तानि देहेन्द्रियाणि
ध्रियन्ते सा च ज्ञेयत्वात् क्षेत्रम्।
सर्वान्तःकरणधर्मोपलक्षणार्थम् इच्छादि-
ग्रहणम् यत् उक्तं तद् उपसंहरति—
एतत् क्षेत्रं समासेन सविकारं सह विकारेण
महदादिना उदाहृतम् उक्तम्। यस्य क्षेत्रभेद-
जातस्य संहतिः इदं शरीरं क्षेत्रम् इति उक्तं
तत् क्षेत्रं व्याख्यातं महाभूतादिभेदभिन्नं
धृत्यन्तम् ॥ ६ ॥
क्षेत्रज्ञो वक्ष्यमाणविशेषणो यस्य सप्रभावस्य क्षेत्रज्ञस्य परिज्ञानाद् अमृतत्वं भवति तं ‘ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि’ इत्यादिना सविशेषणं स्वयम् एव वक्ष्यति भगवान्।
अधुना तु तज्ज्ञानसाधनगणम् अमानित्वादि- लक्षणं यस्मिन् सति तज्ज्ञेयविज्ञाने योग्यः अधिकृतो भवति यत्परः सन्न्यासी ज्ञाननिष्ठ उच्यते, तम्, अमानित्वादिगणं ज्ञानसाधनत्वाद् ज्ञानशब्दवाच्यं विदधाति भगवान्—