आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ॥ ७ ॥
amānitvamadambhitvamahiṃsā kṣāntirārjavam .
ācāryopāsanaṃ śaucaṃ sthairyamātmavinigrahaḥ .. 7 ..
अमानित्व—मानीका भाव अर्थात् अपना बड़प्पन प्रकट करना जो मानित्व है, उसका अभाव अमानित्व कहलाता है।
अदम्भित्व—अपने धर्मको प्रकट करना दम्भित्व है; उसका अभाव अदम्भित्व कहा जाता है।
अहिंसा—हिंसा न करना अर्थात् प्राणियोंको कष्ट न देना। क्षमा—दूसरोंका अपने प्रति अपराध देखकर भी विकाररहित रहना। आर्जव—सरलता, अकुटिलता।
आचार्यकी उपासना—मोक्षसाधनका उपदेश करनेवाले गुरुका शुश्रूषा आदि प्रयोगोंसे सेवन करना।
शौच—शारीरिक मलोंको मिट्टी और जल आदिसे साफ करना और अन्तःकरणके राग-द्वेष आदि मलोंको प्रतिपक्ष-भावनासे* दूर करना।
> जिस दोषको दूर करना हो उसके विरोधी गुणकी भावना करनेका नाम ‘प्रतिपक्ष-भावना है।’
स्थिरता—स्थिरभाव, मोक्षमार्गमें ही निश्चित निष्ठा कर लेना।
आत्मविनिग्रह—आत्माका अपकार करनेवाला और आत्मा शब्दसे कहे जानेवाला, जो कार्य-करणका संघातरूप यह शरीर है, इसका निग्रह अर्थात् इसे स्वाभाविक प्रवृत्तिसे हटाकर सन्मार्गमें ही नियुक्त कर रखना ॥ ७ ॥
तथा—
तात्पर्य पढ़ें
अमानित्वं मानिनो भावो मानित्वम् आत्मनः
श्लाघनं तद्भावः अमानित्वम् ।
अदम्भित्वं स्वधर्मप्रकटीकरणं दम्भित्वं तद्भावः अदम्भित्वम् ।
अहिंसा अहिंसनं प्राणिनाम् अपीडनम् । क्षान्तिः
परापराधप्राप्तौ अविक्रिया। आर्जवम् ऋजुभावो अवक्रत्वम्।
आचार्योपासनं मोक्षसाधनोपदेष्टुः आचार्यस्य
शुश्रूषादिप्रयोगेण सेवनम् ।
शौचं कायमलानां मृज्जलाभ्यां प्रक्षालनम् अन्तः च मनसः प्रतिपक्षभावनया रागादिमलानाम् अपनयनं शौचम् ।
स्थैर्यं स्थिरभावो मोक्षमार्गे एव कृताध्यवसायत्वम् ।
आत्मविनिग्रह आत्मनः अपकारकस्य आत्मशब्दवाच्यस्य कार्यकरणसङ्घातस्य विनिग्रहः स्वभावेन सर्वतः प्रवृत्तस्य सन्मार्गे एव निरोध आत्मविनिग्रहः ॥ ७ ॥