अध्याय 13 - श्लोक 8

किं च—
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च ।
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् ॥ ८ ॥

kiṃ ca—
indriyārtheṣu vairāgyamanahaṅkāra eva ca .
janmamṛtyujarāvyādhiduḥkhadoṣānudarśanam .. 8 ..


इन्द्रियों के शब्दादि विषयों में वैराग्य अर्थात् ऐहिक और पारलौकिक भोगों में आसक्तिका अभाव और अनहंकार—अहंकारका अभाव।

तथा जन्म, मृत्यु, जरा, रोग और दुःखों में अर्थात् जन्म से लेकर दुःखपर्यन्त प्रत्येक में अलग–अलग दोषोंका देखना।

जन्म में गर्भवास और योनिद्वारा बाहर निकलनारूप जो दोष है उसको देखना—उसपर विचार करना। वैसे ही मृत्यु में दोष देखना, एवं बुढ़ापे में प्रज्ञाशक्ति और तेजका तिरोभाव और तिरस्काररूप दोष देखना, तथा सिर-पीड़ादि रोग रूप व्याधियों में दोषोंका देखना, अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवके निमित्तसे होनेवाले तीनों प्रकारके दुःखों में दोष देखना।

अथवा (यह भी अर्थ किया जा सकता है कि) दुःख ही दोष है, इस दुःखरूप दोषको पहले कहे हुए प्रकारसे जन्मादि में देखना अर्थात् जन्म दुःखमय है, मरना दुःख है, बुढ़ापा दुःख है और सब रोग दुःख हैं—इस प्रकार देखना, परंतु (यह ध्यान रहे कि) ये जन्मादि दुःख के कारण होनेसे ही दुःख हैं, स्वरूपसे दुःख नहीं हैं।

इस प्रकार जन्मादि में दुःखरूप दोषको बारंबार देखनेसे शरीर, इन्द्रिय और विषयभोगों में वैराग्य उत्पन्न हो जाता है। उससे मन-इन्द्रियादि करणों की आत्मसाक्षात्कार करनेके लिये अन्तरात्मा में प्रवृत्ति हो जाती है। इस प्रकार ज्ञानका कारण होनेसे जन्मादि में दुःखरूप दोषकी बारंबार आलोचना करना ‘ज्ञान’ कहा जाता है ॥ ८ ॥

तथा—

तात्पर्य पढ़ें

इन्द्रियार्थेषु शब्दादिषु दृष्टादृष्टेषु भोगेषु विरागभावो वैराग्यम् । अनहङ्कारः अहङ्काराभाव एव च ।

जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनं जन्म च मृत्युः च जरा च व्याधयः च दुःखानि च तेषु जन्मादिदुःखान्तेषु प्रत्येकं दोषानुदर्शनम् ।

जन्मनि गर्भवासयोनिद्वारा निःसरणं दोषः तस्य अनुदर्शनम् आलोचनम्, तथा मृत्यौ दोषानुदर्शनम्, तथा जरायां प्रज्ञाशक्तितेजो निरोधदोषानुदर्शनं परिभूतता च इति। तथा व्याधिषु शिरोरोगादिषु दोषानुदर्शनम्, तथा दुःखेषु अध्यात्माधिभूताधिदैवनिमित्तेषु।

अथवा दुःखानि एव दोषो दुःखदोषः तस्य जन्मादिषु पूर्ववद् अनुदर्शनम् । दुःखं जन्म दुःखं मृत्युः दुःखं जरा दुःखं व्याधयः । दुःखनिमित्तत्त्वाद् जन्मादयो दुःखं न पुनः स्वरूपेण एव दुःखम् इति ।

एवं जन्मादिषु दुःखदोषानुदर्शनाद् देहेन्द्रियविषयभोगेषु वैराग्यम् उपजायते । ततः प्रत्यगात्मनि प्रवृत्तिः करणानाम् आत्म-दर्शनाय । एवं ज्ञानहेतुत्वाद् ज्ञानम् उच्यते जन्मादिदुःखदोषानुदर्शनम् ॥ ८ ॥