अध्याय 13 - श्लोक 9

किं च—
असक्तिरनभिष्वङ्गः
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ॥ ९ ॥

kiṃ ca—
asaktiranabhiṣvaṅgaḥ
nityaṃ ca samacittatvamiṣṭāniṣṭopapattiṣu .. 9 ..


असक्ति—आसक्ति-निमित्तक विषयों में प्रीतिमात्र का नाम सक्ति है, उसका अभाव।

अनभिष्वंग—अभिष्वंग का अभाव। मोहपूर्वक अनन्य आत्मभावनारूप जो विशेष आसक्ति है उसका नाम अभिष्वंग है। जैसे दूसरे के सुखी या दुःखी होने पर यह मानना कि मैं ही सुखी-दुःखी हूँ। अथवा किसी अन्य के जीने-मरने पर मैं ही जीता हूँ या मर जाऊँगा, ऐसा मानना।

(ऐसा अभिष्वंग) कहाँ होता है? (सो कहते हैं) पुत्र, स्त्री और घर आदि में अर्थात् पुत्र में, स्त्री में, घर में तथा आदि शब्द का ग्रहण होने से अन्य जो कोई दासवर्ग आदि अत्यन्त प्रिय होते हैं उनमें भी। असक्ति और अनभिष्वंग ये दोनों ही ज्ञान के साधन हैं, इसलिये इनको भी ज्ञान कहते हैं।

तथा नित्य समचित्तता अर्थात् निरन्तर चित्त की समानता—किसमें? इष्ट अथवा अनिष्ट की प्राप्ति में, अर्थात् प्रिय और अप्रिय की जो बारंबार प्राप्ति होती रहती है उसमें सदा ही चित्त का सम रहना। इस साधन वाला प्रिय की प्राप्ति में हर्षित नहीं होता और अप्रिय की प्राप्ति में क्रोधयुक्त नहीं होता। इस प्रकार की जो चित्त की नित्य समता है वह भी ‘ज्ञान’ है ॥ ९ ॥

तथा—

तात्पर्य पढ़ें

असक्तिः सक्तिः सङ्गनिमित्तेषु विषयेषु प्रीतिमात्रं तदभावः असक्तिः ।

अनभिष्वङ्गः अभिष्वङ्गाभावः । अभिष्वङ्गः नाम सक्तिविशेष एव अनन्यात्मभावनालक्षणः । यथा अन्यस्मिन् सुखिनि दुःखिनि वा अहम् एव सुखी दुःखी च जीवति मृते वा अहम् एव जीवामि मरिष्यामि च इति ।

क्क इति आह, पुत्रदारगृहादिषु, पुत्रेषु दारेषु गृहेषु, आदिग्रहणाद् अन्येषु अपि अत्यन्तेष्टेषु दासवर्गादिषु। तत् च उभयं ज्ञानार्थत्वाद् ज्ञानम् उच्यते।

‘नित्यं च समचित्तत्वं तुल्यचित्तता, क्व, इष्टानिष्टोपपत्तिषु इष्टानाम् अनिष्टानां च उपपत्तयः सम्प्राप्तयः तासु इष्टानिष्टोपपत्तिषु नित्यम् एव तुल्यचित्तता, इष्टोपपत्तिषु न हृष्यति न कुप्यति च अनिष्टोपपत्तिषु। तत् च एतद् नित्यं समचित्तत्वं ज्ञानम् ॥ ९ ॥