नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति
गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ॥ १९ ॥
गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ॥ १९ ॥
nānyaṃ guṇebhyaḥ kartāraṃ yadā draṣṭānupaśyati
guṇebhyaśca paraṃ vetti madbhāvaṃ so’dhigacchati .. 19 ..
जिस समय द्रष्टा पुरुष ज्ञानी होकर, कार्य, करण और विषयों के आकार में परिणत हुए गुणों से अतिरिक्त अन्य किसी को (भी) कर्ता नहीं देखता है, अर्थात् यही देखता है कि समस्त अवस्थाओं में स्थित हुए गुण ही समस्त कर्मों के कर्ता हैं तथा गुणों के व्यापार के साक्षीरूप आत्मा को गुणों से पर जानता है, तब वह द्रष्टा मेरे भाव को प्राप्त होता है ॥ १९ ॥
कैसे प्राप्त होता है? सो बतलाते हैं—
तात्पर्य पढ़ें
नान्यं कार्यकरणविषयाकारपरिणतेभ्यो गुणेभ्यः कर्तारम् अन्यं यदा द्रष्टा विद्वान् सन् न अनुपश्यति। गुणा एव सर्वावस्थाः सर्वकर्मणां कर्तार इति एवं पश्यति। गुणेभ्यः च परं गुणव्यापारसाक्षिभूतं वेत्ति मद्भावं मम भावं स द्रष्टा अधिगच्छति ॥ १९ ॥
कथम् अधिगच्छति इति उच्यते—