अध्याय 14 - श्लोक 2

इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।
सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥ २ ॥

idaṃ jñānamupāśritya mama sādharmyamāgatāḥ .
sarge’pi nopajāyante pralaye na vyathanti ca .. 2 ..


इस उपर्युक्त ज्ञान का भलीभाँति आश्रय लेकर अर्थात् ज्ञान के साधनों का अनुष्ठान करके, मुझ परमेश्वर की समानता को—मेरे साथ एकरूपता को प्राप्त हुए पुरुष सृष्टिके उत्पत्तिकाल में भी फिर उत्पन्न नहीं होते और प्रलयकाल में—ब्रह्मा के विनाशकाल में भी व्यथा को प्राप्त नहीं होते अर्थात् गिरते नहीं। यह फल का वर्णन ज्ञान की स्तुतिके लिये किया गया है। यहाँ ‘साधर्म्य’ का अर्थ ‘समानधर्मता’ नहीं है; क्योंकि गीताशास्त्र में क्षेत्रज्ञ और ईश्वर का भेद स्वीकार नहीं किया गया ॥ २ ॥

अब यह बतलाते हैं कि इस प्रकार का क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का संयोग भूतों का कारण है—

तात्पर्य पढ़ें

इदं ज्ञानं यथोक्तम् उपाश्रित्य ज्ञानसाधनम् अनुष्ठाय इति एतत् । मम परमेश्वरस्य साधर्म्यं मत्स्वरूपताम् आगताः प्राप्ता इत्यर्थो न तु समानधर्मतां साधर्म्यं क्षेत्रज्ञेश्वरयोः भेदानभ्युपगमद् गीताशास्त्रे । फलवादः च अयं स्तुत्यर्थम् उच्यते । सर्गे अपि सृष्टिकाले अपि न उपजायन्ते न उत्पद्यन्ते प्रलये ब्रह्मणः अपि विनाशकाले न व्यथन्ति च व्यथां न आपद्यन्ते न च्यवन्ति इत्यर्थः ॥ २ ॥

क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोग ईदृशो भूतकारणम् इति आह—