अध्याय 14 - श्लोक 22

प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव।
न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति ॥ २२ ॥

prakāśaṃ ca pravṛttiṃ ca mohameva ca pāṇḍava.
na dveṣṭi sampravṛttāni na nivṛttāni kāṅkṣati .. 22 ..


सत्त्वगुणका कार्य प्रकाश, रजोगुणका कार्य प्रवृत्ति और तमोगुणका कार्य मोह, ये जब प्राप्त होते हैं अर्थात् भली प्रकार विषयभावसे उपलब्ध होते हैं, तब वह इनसे द्वेष नहीं किया करता।

अभिप्राय यह कि ‘मुझमें तामसभाव उत्पन्न हो गया, उससे मैं मोहित हो गया और दुःखरूप राजसी प्रवृत्ति मुझमें उत्पन्न हुई, उस राजस भावने मुझे प्रवृत्त कर दिया, इसने मुझे स्वरूपसे विचलित कर दिया, यह जो अपनी स्वरूप स्थितिसे विचलित होना है, वह मेरे लिये बड़ा भारी दुःख है तथा प्रकाशमय सात्त्विक गुण, मुझे विवेकित्व प्रदान करके और सुखमें नियुक्त करके बाँधता है’, इस प्रकार साधारण मनुष्य अयथार्थदर्शी होनेके कारण उन गुणोंसे द्वेष किया करते हैं, परंतु गुणातीत पुरुष उनकी प्राप्ति होनेपर उनसे द्वेष नहीं करता।

तथा जैसे सात्त्विक, राजस और तामस पुरुष जब सात्त्विक आदि भाव अपना स्वरूप प्रत्यक्ष कराकर निवृत्त हो जाते हैं तब (पुनः) उनको चाहते हैं। वैसे गुणातीत उन निवृत्त हुए गुणोंके कार्योंको नहीं चाहता यह अभिप्राय है।

(परंतु ये सब लक्षण दूसरोंको प्रत्यक्ष होनेवाले नहीं हैं। तो कैसे हैं? अपने-आपको ही प्रत्यक्ष होनेके कारण ये स्वसंवेद्य ही हैं; क्योंकि अपने-आपमें होनेवाले द्वेष या आकांक्षाको दूसरा नहीं देख सकता ॥ २२ ॥

अब, गुणातीत पुरुष किस प्रकारके आचरणवाला होता है, इस प्रश्नका उत्तर देते हैं—

तात्पर्य पढ़ें

प्रकाशं च सत्त्वकार्यं प्रवृत्तिं च रजःकार्यं मोहम् एव च तमःकार्यम् इति एतानि न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि सम्यग्विषयभावेन उद्भूतानि।

मम तामसः प्रत्ययो जातः तेन अहं मूढः तथा राजसी प्रवृत्तिः मम उत्पन्ना दुःखात्मिका तेन अहं रजसा प्रवर्तितः प्रचलितः स्वरूपात् कष्टं मम वर्तते यः अयं मत्स्वरूपावस्थानाद् भ्रंशः तथा सात्त्विको गुणः प्रकाशात्मा मां विवेकित्वम् आपादयन् सुखे च सञ्जयन् बध्नाति इति तानि द्वेष्टि असम्यग्दर्शित्वेन। तद् एवं गुणातीतो न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि।

यथा च सात्त्विकादिपुरुषः सात्त्विकादि-कार्याणि आत्मानं प्रति प्रकाश्य निवृत्तानि काङ्क्षति न तथा गुणातीतो निवृत्तानि काङ्क्षति इत्यर्थः।

एतद् न परप्रत्यक्षं लिङ्गं किं तर्हि स्वात्म-प्रत्यक्षत्वाद् आत्मविषयम् एव एतद् लक्षणम्। न हि स्वात्मविषयं द्वेषम् आकाङ्क्षां वा परः पश्यति ॥ २२ ॥

अथ इदानीं गुणातीत: किमाचार इति प्रश्नस्य प्रतिवचनम् आह—