मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो
सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते ॥ २५ ॥
kiṃ ca—
mānāpamānayostulyastulyo
sarvārambhaparityāgī guṇātītaḥ sa ucyate .. 25 ..
जो मान और अपमान में समान अर्थात् निर्विकार रहता है तथा मित्र और शत्रुपक्ष के लिये तुल्य है। यद्यपि कोई-कोई पुरुष अपने विचार से तो उदासीन होते हैं, परंतु दूसरों की समझ से वे मित्र या शत्रुपक्ष वाले-से ही होते हैं, इसलिये कहते हैं कि जो मित्र और शत्रुपक्ष के लिये तुल्य है।
तथा जो सारे आरम्भों का त्याग करनेवाला है। दृष्ट और अदृष्ट फल के लिये किये जानेवाले कर्मों का नाम ‘आरम्भ’ है, ऐसे समस्त आरम्भों का त्याग करने का जिसका स्वभाव है वह ‘सर्वारम्भपरित्यागी’ है अर्थात् जो केवल शरीरधारण के लिये आवश्यक कर्मों के सिवा सारे कर्मों का त्याग कर देनेवाला है, वह पुरुष ‘गुणातीत’ कहलाता है।
‘उदासीनवत्’ यहाँ से लेकर ‘गुणातीतः स उच्यते’ यहाँ तक जो भाव बतलाये गये हैं, वे सब जबतक प्रयत्न से सम्पादन करनेयोग्य रहते हैं, तबतक तो मुमुक्षु—संन्यासी के लिये अनुष्ठान करनेयोग्य गुणातीतत्व-प्राप्ति के साधन हैं और जब वे स्थिर हो जाते हैं, तो गुणातीत संन्यासी के स्वसंवेद्य लक्षण बन जाते हैं ॥ २५ ॥
मनुष्य इन तीनों गुणों से किस प्रकार अतीत होता है ? इस प्रश्न का उत्तर अब देते हैं—
तात्पर्य पढ़ें
मानापमानयोः तुल्यः समो निर्विकारः तुल्यो मित्रारिपक्षयोः, यद्यपि उदासीना भवन्ति केचित् स्वाभिप्रायेण तथापि पराभिप्रायेण मित्रारिपक्षयोः इव भवन्ति इति तुल्यो मित्रारिपक्षयोः इति आह।
सर्वारम्भपरित्यागी दृष्टादृष्टार्थानि कर्माणि आरभ्यन्ते इति आरम्भाः सर्वान् आरम्भान् परित्यक्तुं शीलम् अस्य इति सर्वारम्भपरित्यागी देहधारणमात्रनिमित्तव्यतिरेकेण सर्वकर्म-परित्यागी इत्यर्थः । गुणातीतः स उच्यते ।
‘उदासीनवत्’ इत्यादि ‘गुणातीतः स उच्यते’ इति एतद् अन्तम् उक्तं यावद् यत्नसाध्यं तावत् सन्न्यासिनः अनुष्ठेयं गुणातीतत्वसाधनं मुमुक्षोः स्थिरीभूतं तु स्वसंवेद्यं सद् गुणातीतस्य यतेः लक्षणं भवति इति ॥ २५ ॥
अधुना कथं च त्रीन् गुणान् अतिवर्तते इति प्रश्नस्य प्रतिवचनम् आह—