अध्याय 14 - श्लोक 26

मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते ।
स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ २६ ॥

māṃ ca yo’vyabhicāreṇa bhaktiyogena sevate .
sa guṇānsamatītyaitānbrahmabhūyāya kalpate .. 26 ..


जो संन्यासी या कर्मयोगी सब भूतों के हृदय में स्थित मुझ परमेश्वर नारायण को, कभी व्यभिचरित (विचलित) न होनेवाले अव्यभिचारी भक्तियोग द्वारा सेवन करता है—भजन का नाम भक्ति है, वही योग है, उस भक्तियोग के द्वारा जो मेरी सेवा करता है—वह इन ऊपर कहे हुए गुणों को अतिक्रमण करके ब्रह्मलोक को पाने के लिये, अर्थात् मोक्ष प्राप्त करने के लिये योग्य समझा जाता है, अर्थात् (मोक्ष प्राप्त करने में) समर्थ होता है ॥ २६ ॥

| ऐसा क्यों होता है? सो बतलाते हैं—

तात्पर्य पढ़ें

मां च ईश्वरं नारायणं सर्वभूतहृदयाश्रितं यो यतिः कर्मी वा अव्यभिचारेण न कदाचिद् यो व्यभिचरति भक्तियोगेन भजनं भक्तिः सा एव योगः तेन भक्तियोगेन सेवते स गुणान् समतीत्य एतान् यथोक्तान् ब्रह्मभूयाय भवनं भूयो ब्रह्मभूयाय ब्रह्मभवनाय मोक्षाय कल्पते समर्थो भवति इत्यर्थः ॥ २६ ॥

कुत एतद् इति उच्यते—