अध्याय 14 - श्लोक 4

सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः ।
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥ ४ ॥

sarvayoniṣu kaunteya mūrtayaḥ sambhavanti yāḥ .
tāsāṃ brahma mahadyonirahaṃ bījapradaḥ pitā .. 4 ..


हे कुन्तीपुत्र! देव, पितृ, मनुष्य, पशु और मृग आदि समस्त योनियों में जो मूर्तियाँ अर्थात् शरीराकार अलग-अलग अङ्गोंके अवयवोंकी रचनायुक्त व्यक्तियाँ उत्पन्न होती हैं, उन सब मूर्तियों की सब प्रकार से स्थित महत् ब्रह्मरूप मेरी माया तो गर्भ धारण करनेवाली योनि है और मैं ईश्वर बीज प्रदान करनेवाला अर्थात् गर्भाधान करनेवाला पिता हूँ ॥ ४ ॥

वे गुण कौन-कौन-से हैं और कैसे बाँधते हैं? सो कहते हैं—

तात्पर्य पढ़ें

देवपितृमनुष्यपशुमृगादिसर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयो देहसंस्थानलक्षणा मूर्छिताङ्गावयवा मूर्तयः सम्भवन्ति याः तासां मूर्तीनां ब्रह्म महत् सर्वावस्थं योनिः कारणम् अहम् ईशो बीजप्रदो गर्भाधानस्य कर्ता पिता ॥ ४ ॥

के गुणाः कथं बध्नन्ति इति उच्यते—