निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ॥ ५ ॥
sattvaṃ rajastama iti guṇāḥ prakṛtisambhavāḥ .
nibadhnanti mahābāho dehe dehinamavyayam .. 5 ..
सत्त्व, रज और तम—ऐसे नामों वाले ये तीन गुण हैं। ‘गुण’ शब्द पारिभाषिक है। यहाँ रूप, रस आदिकी भाँति किसी द्रव्यके आश्रित गुणोंका ग्रहण नहीं है, तथा ‘गुण’ और ‘गुणवान्’ (प्रकृति)-का भेद भी यहाँ विवक्षित नहीं है।
जैसे रूपादि गुण द्रव्यके अधीन होते हैं वैसे ही ये सत्त्वादि गुण सदा क्षेत्रज्ञके अधीन हुए ही अविद्यात्मक होनेके कारण मानो क्षेत्रज्ञको बाँध लेते हैं। उस (क्षेत्रज्ञ)-को आश्रय बनाकर ही (ये गुण) अपना स्वरूप प्रकट करने में समर्थ होते हैं, अत: ‘बाँधते हैं’ ऐसा कहा जाता है।
जिसकी भुजाएँ अतिशय सामर्थ्ययुक्त और जानु (घुटनों)-तक लंबी हों, उसका नाम महाबाहु है। हे महाबाहो! भगवान्की मायासे उत्पन्न ये तीनों गुण इस शरीरमें शरीरधारी अविनाशी क्षेत्रज्ञको मानो बाँध लेते हैं। क्षेत्रज्ञका ‘अविनाशित्व’ ‘अनादित्वात्’ इत्यादि श्लोकमें कहा ही है।
पू०—पहले यह कहा है कि देही—आत्मा लिप्त नहीं होता, फिर यहाँ यह विपरीत बात कैसे कही जाती है कि उसको गुण बाँधते हैं।
उ०—‘इव’ शब्दका अध्याहार करके हमने इस शङ्काका परिहार कर दिया है। अर्थात् वास्तवमें नहीं बाँधते, बाँधते हुए से प्रतीत होते हैं ॥ ५ ॥
तात्पर्य पढ़ें
सत्त्वं रजः तम इति एवं नामानः, गुणा इति पारिभाषिकः शब्दो न रूपादिवद्द्रव्याश्रिताः । न च गुणगुणिनोः अन्यत्वम् अत्र विवक्षितम् ।
तस्माद् गुणा इव नित्यपरतन्त्राः क्षेत्रज्ञं प्रति अविद्यात्मकत्वात् क्षेत्रज्ञं निबध्नन्ति इव तम् आस्पदीकृत्य आत्मानं प्रतिलभन्ते इति निबध्नन्ति इति उच्यते।
ते च प्रकृतिसंभवा भगवन्मायासंभवा निबध्नन्ति इव। हे महाबाहो महान्तौ समर्थतरौ आजानुप्रलम्बौ बाहू यस्य स महाबाहुः हे महाबाहो देहे शरीरे देहिनं देहवन्तम् अव्ययम् अव्ययत्वं च उक्तम् ‘अनादित्वात्’ इत्यादिश्लोके ।
ननु देही न लिप्यते इति उक्तं तत् कथम्
इह निबध्नन्ति इति अन्यथा उच्यते।
परिहृतम् अस्माभिः इव शब्देन निबध्नन्ति