अध्याय 14 - श्लोक 6

तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम् ।
सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ ॥ ६ ॥

tatra sattvaṃ nirmalatvātprakāśakamanāmayam .
sukhasaṅgena badhnāti jñānasaṅgena cānagha .. 6 ..


उन सत्त्व आदि तीन गुणोंमेंसे पहले सत्त्वगुणका लक्षण बतलाया जाता है—

सत्त्वगुण स्फटिक-मणिकी भाँति निर्मल होनेके कारण, प्रकाशशील और उपद्रवरहित है (तो भी) वह बाँधता है।

कैसे बाँधता है? सुखकी आसक्तिसे। (वास्तवमें) विषयरूप सुखका विषयी आत्माके साथ ‘मैं सुखी हूँ’ इस प्रकार सम्बन्ध जोड़ देना यह आत्माको मिथ्या ही सुखमें नियुक्त कर देना है। यही अविद्या है।

क्योंकि विषयके धर्म विषयीके (कभी) नहीं होते और इच्छासे लेकर धृतिपर्यन्त सब धर्म विषयरूप क्षेत्रके ही हैं—ऐसा भगवान् ने कहा है।

सुतरां यह सिद्ध हुआ कि जो आरोपितभावसे आत्माकी स्वकीय धर्मरूपा हो रही है और विषय-विषयीका अज्ञान ही जिसका स्वरूप है, ऐसी अविद्याद्वारा ही सत्त्वगुण अनात्मस्वरूप सुखमें (आत्माको) मानो नियुक्त—आसक्त कर देता है, यानी जो (वास्तवमें) सुखके सम्बन्धसे रहित है, उसे सुखी-सा कर देता है। इसी प्रकार (यह सत्त्वगुण उसे) ज्ञानके सङ्गसे भी (बाँधता है)।

ज्ञान भी सुखका साथी होनेके कारण, क्षेत्र अर्थात् अन्तःकरणका ही धर्म है, आत्माका नहीं— क्योंकि आत्माका धर्म मान लेनेपर उसमें आसक्त होना और उसका बाँधना नहीं बन सकता। इसलिये हे निष्पाप! अर्थात् व्यसन-दोष-रहित अर्जुन! सुखकी भाँति ही ज्ञान आदिके ‘सङ्ग’ को भी (बन्धन करनेवाला) समझना चाहिये ॥ ६ ॥

तात्पर्य पढ़ें

तत्र सत्त्वादीनां सत्त्वस्य एव तावद् लक्षणम् उच्यते—

निर्मलत्वात् स्फटिकमणिः इव प्रकाशकम्

अनामयं निरुपद्रवं सत्त्वं तद् निबध्नाति।

कथम्, सुखसङ्गेन सुखी अहम् इति विषयभूतस्य सुखस्य विषयिणि आत्मनि संश्लेषापादनं मृषा एव सुखे सञ्जनम् इति। सा एषा अविद्या।

न हि विषयधर्मो विषयिणो भवति। इच्छादि च धृत्यन्तं क्षेत्रस्य एव विषयस्य धर्म इति उक्तं भगवता।

अतः अविद्यया एव स्वकीयधर्मभूतया

विषयविषय्यविवेकलक्षणया अस्वात्मभूते सुखे

सञ्जयति इव सक्तम् इव करोति असुखिनं

सुखिनम् इव। तथा ज्ञानसङ्गेन च।।

ज्ञानम् इति सुखसाहचर्यात् क्षेत्रस्य एव

अन्तःकरणस्य धर्मो न आत्मनः आत्म-

धर्मत्वे सङ्गानुपपत्तेः बन्धानुपपत्तेः च।

सुखे इव ज्ञानादौ सङ्गो मन्तव्यो हे