अध्याय 15 - श्लोक 1

श्रीभगवानुवाच—
ऊर्ध्वमूलमध:शाखमश्नत्थं
प्राहुरव्ययम् ।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥ १ ॥

śrībhagavānuvāca—
ūrdhvamūlamadha:śākhamaśnatthaṃ
prāhuravyayam .
chandāṃsi yasya parṇāni yastaṃ veda sa vedavit .. 1 ..


(यह संसाररूप वृक्ष) ऊर्ध्वमूलवाला है। कालकी अपेक्षा भी सूक्ष्म, सबका कारण, नित्य और महान् होनेके कारण अव्यक्त-मायाशक्तियुक्त ब्रह्म सबसे ऊँचा कहा जाता है, वही इसका मूल है, इसलिये यह संसारवृक्ष ऊपरकी ओर मूलवाला है। ‘ऊपर मूल और नीचे शाखावाला’ इस श्रुतिसे भी यही प्रमाणित होता है।

पुराणमें भी कहा है—

‘अव्यक्तरूप मूलसे उत्पन्न हुआ; उसीके अनुग्रहसे बढ़ा हुआ, बुद्धिरूप प्रधान शाखासे युक्त, बीच-बीचमें इन्द्रियरूप कोटरोंवाला, महाभूतरूप शाखा-प्रतिशाखाओंवाला, विषयरूप पत्तोंवाला, धर्म और अधर्मरूप सुन्दर पुष्पोंवाला तथा जिसमें सुख-दुःखरूप फल लगे हुए हैं ऐसा

यह सब भूतोंका आजीव्य* सनातन ब्रह्मवृक्ष है। यही ब्रह्मवन है, इसीमें ब्रह्म सदा रहता है। ऐसे इसी ब्रह्मवृक्षका ज्ञानरूप श्रेष्ठ खड्गद्वारा छेदन-भेदन करके और आत्मामें प्रीतिलाभ करके फिर वहाँसे नहीं लौटता’ इत्यादि।

> जिसके आश्रयसे जीविका निर्वाह की जाय, उसे आजीव्य कहते हैं।

ऐसे ऊपर मूल और नीचे शाखावाले इस मायामय संसारवृक्षको, अर्थात् महत्तत्त्व, अहंकार, तन्मात्रादि, शाखाकी भाँति जिसके नीचे हैं, ऐसे इस नीचेकी ओर शाखावाले और कलतक भी न रहनेवाले इस क्षणभङ्गुर अश्वत्थ वृक्षको अव्यय कहते हैं।

यह मायामय संसार, अनादि कालसे चला आ रहा है, इसीसे यह संसारवृक्ष अव्यय माना जाता है तथा यह आदि-अन्तसे रहित शरीर आदिकी परम्पराका आश्रय सुप्रसिद्ध है, अतः इसको अव्यय कहते हैं।

उस संसार वृक्षका ही यह अन्य विशेषण (कहा जाता) है।

ऋक्, यजु और सामरूप वेद जिस संसारवृक्षके पत्तोंकी भाँति रक्षा करनेवाले होनेसे पत्ते हैं। जैसे पत्ते वृक्षकी रक्षा करनेवाले होते हैं, वैसे ही वेद धर्म-अधर्म, उनके कारण और फलको प्रकाशित करनेवाले होनेसे संसाररूप वृक्षकी रक्षा करनेवाले हैं।

ऐसा जो यह विस्तारपूर्वक बतलाया हुआ संसारवृक्ष है, इसको जो मूलके सहित जानता है, वह वेदको जाननेवाला अर्थात् वेदके अर्थको जाननेवाला है।

क्योंकि इस मूलसहित संसारवृक्षसे अतिरिक्त अन्य जाननेयोग्य वस्तु अणुमात्र भी नहीं है। सुतरां जो इस प्रकार वेदार्थको जाननेवाला है वह सर्वज्ञ है। इस प्रकार मूलसहित संसारवृक्षके ज्ञानकी स्तुति करते हैं ॥ १ ॥

उसी संसारवृक्षके अन्य अङ्गोंकी कल्पना कही जाती है।

तात्पर्य पढ़ें

ऊर्ध्वमूलं कालतः सूक्ष्मत्वात् कारणत्वाद् नित्यत्वाद् महत्त्वात् च ऊर्ध्वम् उच्यते ब्रह्म अव्यक्तमायाशक्तिमत् तद् मूलम् अस्य इति सः अयं संसारवृक्ष ऊर्ध्वमूलः । श्रुतेः च—‘ऊर्ध्वमूलो—ऽवाक्शाखः’ (क० उ० २।६।१) इति ।

पुराणे च—

‘ अव्यक्तमूलप्रभवस्तस्यैवानुग्रहोत्थितः । ‘

बुद्धिस्कन्धमयश्चैव इन्द्रियान्तरकोटरः ।।

महाभूतविशाखश्च विषयैः पत्रवांस्तथा ।

धर्माधर्मसुपुष्पश्च सुखदुःखफलोदयः ।।

आजीव्यः सर्वभूतानां ब्रह्मवृक्षः सनातनः । एतद्ब्रह्मवनं चैव ब्रह्माचरति नित्यशः ॥ एतच्छित्त्वा च भित्त्वा च ज्ञानेन परमासिना । ततश्चात्मरतिं प्राप्य तस्मान्नावर्तते पुनः ॥’ इत्यादि ।

तम् ऊर्ध्वमूलं संसारमायामयं वृक्षम् अधःशाखं महदहङ्कारतन्मात्रादयः शाखा इव अस्य अधो भवन्ति इति सः अयम् अधःशाखः तम् अधःशाखं न श्वः अपि स्थाता इति अश्वत्थः तं क्षणप्रध्वसिनम् अश्वत्थं प्राहुः कथयन्ति अव्ययम् ।

संसारमायामयम् अनादिकालप्रवृत्तत्वात् सः

अयं संसारवृक्षः अव्ययः अनाद्यन्तदेहादि-सन्तानाश्रयो हि सुप्रसिद्धः तम् अव्ययम्।

तस्य एव संसारवृक्षस्य इदम् अन्यद् विशेषणम्।

छन्दांसि छादनाद् ऋग्यजुःसामलक्षणानि यस्य संसारवृक्षस्य पर्णानि इव पर्णानि । यथा वृक्षस्य परिरक्षणार्थानि पर्णानि तथा वेदाः संसारवृक्षपरिरक्षणार्था धर्माधर्मतद्धेतुफल-प्रकाशनार्थत्वात् ।

यथाव्याख्यातं संसारवृक्षं समूलं यः तं वेद

स वेदविद् वेदार्थविद् इत्यर्थः ।

न हि संसारवृक्षाद् अस्मात् समूलाद् ज्ञेयः अन्यः अणुमात्रः अपि अवशिष्टः अस्ति अतः सर्वज्ञः स यो वेदार्थविद् इति समूलवृक्ष- ज्ञानं स्तौति ॥ १ ॥

तस्य एव संसारवृक्षस्य अपरा अवयवकल्पना उच्यते—