गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा ।
पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ॥ १३ ॥
kiṃ ca—
gāmāviśya ca bhūtāni dhārayāmyahamojasā .
puṣṇāmi cauṣadhīḥ sarvāḥ somo bhūtvā rasātmakaḥ .. 13 ..
मैं पृथिवीमें प्रविष्ट होकर अपने उस बल से, जो कि कामना और आसक्ति से रहित मेरा ऐश्वर्य-बल जगत् को धारण करने के लिये पृथिवीमें प्रविष्ट है, जिस बल के कारण भारवती पृथिवी नीचे नहीं गिरती और फटती भी नहीं, सारे जगत् को धारण करता हूँ।
यही बात वेदमन्त्र भी कहते हैं कि ‘जिससे द्युलोक और भारवती पृथिवी दृढ़ है’ तथा ‘वह पृथिवी को धारण करता है’ इत्यादि। अतः यह कहना ठीक ही है कि मैं पृथिवीमें प्रविष्ट होकर चराचर समस्त भूतप्राणियों को धारण करता हूँ।
तथा मैं ही रसस्वरूप चन्द्रमा होकर पृथिवीमें उत्पन्न होनेवाली धान, जौ आदि समस्त ओषधियों का पोषण करता हूँ अर्थात् उनको पुष्ट और स्वादयुक्त किया करता हूँ। जो सब रसों का आत्मा है, रस ही जिसका स्वभाव है, जो समस्त रसों की खानि है वह सोम है, वही अपने रस का सञ्चार करके समस्त वनस्पतियों का पोषण किया करता है ॥ १३ ॥
तात्पर्य पढ़ें
किं च—
तथा—
गां पृथिवीम् आविश्य प्रविश्य धारयामि भूतानि जगद् अहम् ओजसा बलेन यद् बलं कामरागविवर्जितम् ऐश्वरं जगद्विधारणाय पृथिव्यां प्रविष्टं येन गुर्वीं पृथिवी न अधः पतति न विदीर्यते च।
तथा च मन्त्रवर्णः—‘येन द्यौरुग्रा पृथिवी च दृढा’ (तै० सं० ४। १। ८) इति। ‘स दाधार पृथिवीम्’ (तै० सं० ४। १। ८) इत्यादिः च। अतो गाम् आविश्य च भूतानि चराचराणि धारयामि इति युक्तम् उक्तम्।
किं च पृथिव्यां जाता ओषधीः सर्वा व्रीहियवाद्याः पुष्णामि पुष्टिमती रसस्वादुमतीः च करोमि सोमो भूत्वा रसात्मकः सोमः सर्व-रसात्मको रसस्वभावः सर्वरसानाम् आकरः सोमः स हि सर्वा ओषधीः स्वात्मरसानुप्रवेशेन पुष्णाति ॥ १३ ॥