क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥ १६ ॥
dvāvimau puruṣau loke kṣaraścākṣara eva ca .
kṣaraḥ sarvāṇi bhūtāni kūṭastho’kṣara ucyate .. 16 ..
समुदायरूप से पृथक् किये हुए ये दो भाव संसार में पुरुष नाम से कहे जाते हैं। इनमें से एक समुदाय क्षीण होनेवाला—नाशवान् क्षर पुरुष है और दूसरा उससे विपरीत अक्षर पुरुष है, जो कि भगवान् की मायाशक्ति है, क्षर पुरुष की उत्पत्तिका बीज है तथा अनेक संसारी जीवों की कामना और कर्म आदि के संस्कारों का आश्रय है, वह अक्षर पुरुष कहलाता है।
वे दोनों पुरुष कौन हैं? सो भगवान् स्वयं ही बतलाते हैं—
समस्त भूत अर्थात् प्रकृतिका सारा विकार तो क्षर पुरुष है और कूटस्थ अर्थात् जो कूट—राशिकी भाँति स्थित है अथवा कूट नाम मायाका है जिसके वञ्चना, छल, कुटिलता आदि पर्याय हैं, उपर्युक्त माया आदि अनेक प्रकारसे जो स्थित है, वह कूटस्थ है। संसारका बीज, अन्तरहित होने के कारण वह कूटस्थ नष्ट नहीं होता, अतः अक्षर कहा जाता है ॥ १६ ॥
तथा जो क्षर और अक्षर—इन दोनोंसे विलक्षण है और क्षर-अक्षररूप दोनों उपाधियोंके दोषसे रहित है वह नित्य, शुद्ध, बुद्ध और मुक्तस्वभाववाला—
तात्पर्य पढ़ें
द्वौ इमौ पृथग् राशीकृतौ पुरुषौ इति उच्येते लोके संसारे क्षरः च क्षरति इति क्षरो विनाशी एको राशिः अपरः पुरुषः अक्षरः तद्विपरीतो भगवतो मायाशक्तिः क्षराख्यस्य पुरुषस्य उत्पत्तिबीजम् अनेकसंसारिजन्तुकामकर्मादि- संस्काराश्रयः अक्षरः पुरुष उच्यते ।
कौ तौ पुरुषौ इति आह स्वयम् एव भगवान्—
क्षरः सर्वाणि भूतानि समस्तं विकारजातम् इत्यर्थः । कूटस्थः कूटो राशि राशिः इव स्थितः अथवा कूटो माया वञ्चना जिह्वता कुटिलता इति पर्याया अनेकमायादिप्रकारेण स्थितः कूटस्थः संसारबीजानन्त्याद् न क्षरति इति अक्षर उच्यते ॥ १६ ॥
आभ्यां क्षराक्षराभ्यां विलक्षणः क्षराक्षरोपाधि-द्वयदोषेण अस्पृष्टो नित्यशुद्धबुद्धमुक्त-स्वभावः—