अध्याय 15 - श्लोक 17

उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः
परमात्मेत्युदाहृतः ।
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥ १७ ॥

uttamaḥ puruṣastvanyaḥ
paramātmetyudāhṛtaḥ .
yo lokatrayamāviśya bibhartyavyaya īśvaraḥ .. 17 ..


उत्तम—अतिशय उत्कृष्ट पुरुष तो अन्य ही है। अर्थात् इन दोनों से अत्यन्त विलक्षण है, जो कि परमात्मा नाम से कहा गया है। वह ईश्वर अविद्याजनित शरीरादि आत्माओं की अपेक्षा पर है और सब प्राणियों का आत्मा यानी अन्तरात्मा है, इस कारण वेदान्तवाक्यों में वह ‘परमात्मा’ नाम से कहा गया है।

उसी का विशेषरूप से निरूपण करते हैं—

जो पृथ्वी, अन्तरिक्ष और स्वर्ग—इन तीनों लोकों को, अपने चैतन्य-बल की शक्ति से उनमें प्रविष्ट होकर, केवल स्वरूप-सत्तामात्र से उनको धारण करता है और जो अविनाशी ईश्वर है, अर्थात् जिसका कभी नाश न हो, ऐसा नारायण नामक सर्वज्ञ और सबका शासन करनेवाला है ॥ १७ ॥

उपर्युक्त ईश्वर का ‘पुरुषोत्तम’ यह नाम प्रसिद्ध है, उसका यह नाम किस कारण से हुआ? इसकी हेतुसहित उपपत्ति बतलाकर, नाम की सार्थकता दिखलाते हुए भगवान् अपने स्वरूप को प्रकट करते हैं कि ‘मैं निरतिशय ईश्वर हूँ’—

तात्पर्य पढ़ें

उत्तम उत्कृष्टतमः पुरुषः तु अन्यः अत्यन्त-विलक्षण आभ्यां परमात्मा इति परमः च असौ देहाद्यविद्याकृतात्मभ्य आत्मा च सर्वभूतानां प्रत्यक्चेतन इत्यतः परमात्मा इति उदाहृत उक्तो वेदान्तेषु ।

स एव विशेष्यते—

यो लोकत्रयं भूर्भुवःस्वराख्यं स्वकीयया चैतन्यबलशक्त्या आविश्य प्रविश्य बिभर्ति स्वरूपसद्भावमात्रेण बिभर्ति धारयति अव्ययो न अस्य व्ययो विद्यते इति अव्यय ईश्वरः सर्वज्ञो नारायणाख्य ईशनशीलः ॥ १७ ॥

यथा व्याख्यातस्य ईश्वरस्य पुरुषोत्तम इति एतद् नाम प्रसिद्धं तस्य नामनिर्वचनप्रसिद्ध्या अर्थवत्त्वं नाम्नो दर्शयन् निरतिशयः अहम् ईश्वर इति आत्मानं दर्शयति भगवान्—