अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥ २ ॥
adhaścordhvaṃ prasṛtāstasya śākhā guṇapravṛddhā viṣayapravālāḥ .
adhaśca mūlānyanusantatāni karmānubandhīni manuṣyaloke .. 2 ..
अपने उपादान-कारणरूप सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणों से बढ़ी हुई—स्थूलभाव को प्राप्त हुई और विषयरूपी कोंपलोंवाली, उस वृक्ष की बहुत-सी शाखाएँ, जो कि अपने-अपने कर्म और ज्ञान के अनुरूप—कर्म और ज्ञान की फलस्वरूपा योनियाँ हैं, नीचे की ओर मनुष्यों से लेकर स्थावरपर्यन्त और ऊपर की ओर धर्म यानी विश्वकर्ता ब्रह्मापर्यन्त वृक्ष की शाखाओं के समान फैली हुई हैं। कर्मफलरूप देहादि शाखाओं से शब्दादि विषय कोंपलों के समान अङ्कुरित-से होते हैं, इसलिये वे शरीरादिरूप शाखाएँ विषयरूपी कोंपलोंवाली हैं।
संसारवृक्षका परम मूल—उपादानकारण पहले बतलाया जा चुका है। अब कर्मफलजनित राग–द्वेष आदिकी वासनाएँ जो मूलके समान धर्माधर्मविषयक प्रवृत्तिका कारण और अवान्तरसे (आगे–पीछे) होनेवाली हैं (उनको कहते हैं)। वे मनुष्यलोक में कर्मानुबन्धिनी वासनारूप मूलें देवादिकी अपेक्षा नीचे भी, अविच्छिन्नरूपसे फैली हुई हैं। पुण्य–पापरूप कर्म जिनका अनुबन्ध यानी पीछे–पीछे होनेवाला है, अर्थात् जिनकी उत्पत्तिका अनुवर्तन करनेवाला है, वे कर्मानुबन्धी कहलाती हैं। यहाँ मनुष्योंका ही विशेषरूपसे कर्ममें अधिकार प्रसिद्ध है (इसलिये वे मूलें मनुष्य–लोक में कर्मानुबन्धिनी बतलायी गयी हैं) ॥ २ ॥
यह जो वर्णन किया हुआ संसारवृक्ष है—
तात्पर्य पढ़ें
अधो मनुष्यादिभ्यो यावत् स्थावरम् ऊर्ध्वं च यावद् ब्रह्मा विश्वसृजो धर्म इति एतद् अन्तं यथाकर्म यथाश्रुतं ज्ञानकर्मफलानि तस्य वृक्षस्य शाखा इव शाखाः प्रसृताः प्रगता गुणप्रवृद्धा गुणैः सत्त्वरजस्तमोभिः प्रवृद्धा स्थूलीकृता उपादानभूतैः विषयप्रवाला विषयाः शब्दादयः प्रवाला इव देहादिकर्मफलेभ्यः शाखाभ्यः अङ्कुरीभवन्ति इव तेन विषयप्रवालाः शाखाः ।
संसारवृक्षस्य परममूलम् उपादानं कारणं पूर्वम् उक्तम् अथ इदानीं कर्मफलजनितराग-द्वेषादिवासना मूलानि इव धर्माधर्मप्रवृत्ति-कारणानि अवान्तर्भावीनि तानि अधः च देवाद्यपेक्षया मूलानि अनुसन्ततानि अनुप्रविष्टानि कर्मानुबन्धीनि कर्म धर्माधर्मलक्षणम् अनुबन्धः पश्चाद्धावो येषाम् उद्भूतिम् अनुभवति इति तानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके विशेषतः अत्र हि मनुष्याणां कर्माधिकारः प्रसिद्धः ॥ २ ॥
यः तु अयं वर्णितः संसारवृक्षः—