अध्याय 15 - श्लोक 20

इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ ।
एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत ॥ २० ॥

iti guhyatamaṃ śāstramidamuktaṃ mayānagha .
etadbuddhvā buddhimānsyātkṛtakṛtyaśca bhārata .. 20 ..


अभिप्राय यह है कि जिसने करनेयोग्य सब कुछ कर लिया हो, वह कृतकृत्य है, अतः श्रेष्ठ कुल में जन्म लेनेवाले ब्राह्मण द्वारा जो कुछ किया जानेयोग्य है, वह सब भगवान् का तत्त्व जान लेने पर किया हुआ हो जाता है। अन्य प्रकार से किसी के भी कर्तव्य की समाप्ति नहीं होती।

कहा भी है कि ‘हे पार्थ! समस्त कर्म-समुदाय, ज्ञान में सर्वथा समाप्त हो जाता है।’

तथा मनुका भी वचन है कि ‘विशेषरूप से ब्राह्मण के जन्म की यही पूर्णता है; क्योंकि इसी को प्राप्त करके द्विज कृतकृत्य होता है अन्य प्रकार से नहीं।’

हे भारत! क्योंकि तूने मुझसे यह परमार्थतत्त्व सुना है, इसलिये तू कृतार्थ हो गया है ॥ २० ॥

यह गुह्यतम—सबसे अधिक गोपनीय अर्थात् अत्यन्त गूढ़ रहस्य है। वह क्या है? शास्त्र।

यद्यपि सारी गीता का नाम ही शास्त्र कहा जाता है, परंतु यहाँ स्तुति के लिये प्रकरण से यह (पंद्रहवाँ) अध्याय ही ‘शास्त्र’ नाम से कहा गया है। क्योंकि इस अध्याय में केवल सारे गीताशास्त्र का अर्थ ही संक्षेप से नहीं कहा गया है, किंतु इसमें समस्त वेदों का अर्थ भी समाप्त हो गया है। यह कहा भी है कि ‘जो उसे जानता है वही वेद को जाननेवाला है’ ‘समस्त वेदों से मैं ही जाननेयोग्य हूँ।’

हे निष्पाप अर्जुन! ऐसा यह (परम गोपनीय शास्त्र) मैंने कहा है। हे भारत! ऊपर दिखलाये हुए अर्थ से युक्त इस शास्त्र को जानकर ही, मनुष्य बुद्धिमान् और कृतकृत्य होता है, अन्य प्रकार से नहीं।

नवें अध्याय में प्राणियों की दैवी, आसुरी और राक्षसी—ये तीन प्रकार की प्रकृतियाँ बतलायी गयी हैं। उन्हें विस्तारपूर्वक दिखाने के लिये ‘अभयं सत्त्वसंशुद्धिः’ इत्यादि (श्लोकों से युक्त सोलहवाँ) अध्याय आरम्भ किया जाता है।

उन तीनों में दैवी प्रकृति संसार से मुक्त करनेवाली है, तथा आसुरी और राक्षसी प्रकृतियाँ बन्धन करनेवाली हैं, अतः यहाँ दैवी प्रकृति सम्पादन करने के लिये और दूसरी दोनों त्यागने के लिये दिखलायी जाती हैं— श्रीभगवान् बोले—

तात्पर्य पढ़ें

कृतं कृत्यं कर्तव्यं येन स कृतकृत्यो विशिष्टजन्मप्रसूतेन ब्राह्मणेन यत् कर्तव्यं तत् सर्वं भगवत्तत्त्वे विदिते कृतं भवेद् इत्यर्थः । न च अन्यथा कर्तव्यं परिसमाप्यते कस्यचिद् इति अभिप्रायः ।

‘सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते’ इति च उक्तम्।

‘एतद्धि जन्मसामग्र्यं ब्राह्मणस्य विशेषतः।

प्राप्यैतत्कृतकृत्यो हि द्विजो भवति नान्यथा ॥’

(मनुस्मृति १२। ९३) इति च मानवं वचनम्।

यत एतत् परमार्थतत्त्वं मत्तः श्रुतवान् असि ततः कृतार्थः त्वं भारत इति ॥ २० ॥

इति एतद् गुह्यतमं गोप्यतमम् अत्यन्तरहस्यम् इति एतत् । किं तत् शास्त्रम् ।

यद्यपि गीताख्यं समस्तं शास्त्रम् उच्यते तथापि अयम् एव अध्याय इह शास्त्रम् इति उच्यते स्तुत्यर्थं प्रकरणात्। सर्वो हि गीताशास्त्रार्थः अस्मिन् अध्याये समासेन उक्तो न केवलं सर्वः च वेदार्थ इह परिसमाप्तो ‘यस्तं वेद स वेदवित्’ ‘वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः’ इति च उक्तम्।

इदम् उक्तं कथितं मया हे अनघ अपाप। एतत् शास्त्रं यथादर्शितार्थं बुद्ध्वा बुद्धिमान् स्याद् भवेद् न अन्यथा कृतकृत्यः च भारत।

दैवी आसुरी राक्षसी च इति प्राणिनां प्रकृतयो नवमे अध्याये सूचिताः तासां विस्तरेण प्रदर्शनाय अभयं सत्त्वसंशुद्धिः इत्यादिः अध्याय आरभ्यते,

तत्र संसारमोक्षाय दैवी प्रकृतिः निबन्धनाय आसुरी राक्षसी च इति दैव्या आदानाय प्रदर्शनं क्रियते इतरयोः परिवर्जनाय, श्रीभगवानुवाच—

इति श्रीमहाभारते शतसाहस्त्र्यां संहितायां वैयासिक्यां भीष्मपर्वणि

श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन-

संवादे पुरुषोत्तमयोगो नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥

इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यश्रीमच्छंकर-

भगवतः कृतौ श्रीभगवद्गीताभाष्ये पुरुषोत्तमयोगो नाम

पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥