अध्याय 15 - श्लोक 3

न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा ।
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूलमसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा ॥ ३ ॥

na rūpamasyeha tathopalabhyate nānto na cādirna ca sampratiṣṭhā .
aśvatthamenaṃ suvirūḍhamūlamasaṅgaśastreṇa dṛḍhena chittvā .. 3 ..


इसका स्वरूप जैसा यहाँ वर्णन किया गया है, वैसा उपलब्ध नहीं होता; क्योंकि यह स्वप्नकी वस्तु, मृगतृष्णा के जल और मायारचित गन्धर्व-नगरके समान होनेसे, देखते-देखते नष्ट होनेवाला है। इसी कारण इसका अन्त अर्थात् अन्तिमावस्था—अवसान या समाप्ति भी नहीं है।

तथा इसका आदि भी नहीं है, अर्थात् यहाँसे आरम्भ होकर यह संसार चला है, ऐसा किसीसे नहीं जाना जा सकता और इसकी संप्रतिष्ठा—स्थिति भी नहीं है यानी आदि और अन्तके बीचकी अवस्था भी किसीको उपलब्ध नहीं होती।

इस उपर्युक्त सुविरूढमूल यानी जिसकी मूलें—जड़ें अत्यन्त दृढ़ हो गयी हैं—भली प्रकार संगठित हो चुकी हैं, ऐसे संसाररूप अश्वत्थको, असङ्गशस्त्रसे छेदन करके यानी पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणादिसे उपराम हो जाना ही ‘असङ्ग’ है, ऐसे असङ्गशस्त्रसे जो कि परमात्माके सम्मुख होनारूप निश्चयसे दृढ़ किया हुआ है और बारंबार विवेकाभ्यासरूप पत्थरपर घिसकर पैना किया हुआ है, इस संसारवृक्षको बीजसहित उखाड़कर ॥ ३ ॥

तात्पर्य पढ़ें

न रूपम् अस्य इह यथा वर्णितं तथा न एव उपलभ्यते स्वप्नमरीच्युदकमायागन्धर्वनगर-

समत्वाद् दृष्टनष्टस्वरूपो हि स इति अत एव न अन्तो न पर्यन्तो निष्ठा समाप्तिः वा विद्यते।

तथा न च आदिः इत आरभ्य अयं प्रवृत्त

इति न केनचिद् गम्यते । न च सम्प्रतिष्ठा स्थितिः

मध्यम् अस्य न केनचिद् उपलभ्यते ।

अश्वत्थम् एनं यथोक्तं सुविरूढमूलं सुष्ठु विरूढानि विरोहं गतानि मूलानि यस्य तम् एनं सुविरूढमूलम् असङ्गशस्त्रेण असङ्गः पुत्र-वित्तलोकैषणादिभ्यो व्युत्थानं तेन असङ्गशस्त्रेण दृढेन परमात्माभिमुख्यनिश्चयदृढीकृतेन पुनः पुनर्विवेकाभ्यासाश्मनिशितेन छित्वा संसार-वृक्षं सबीजम् उद्धृत्य ॥ ३ ॥