यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥ ६ ॥
na taddhāsayate sūryo na śaśāṅko na pāvakaḥ.
yadgatvā na nivartante taddhāma paramaṃ mama .. 6 ..
‘तत्’ शब्द का आगेवाले—व्यवधानयुक्त ‘धाम’ शब्द के साथ सम्बन्ध है।
उस तेजोमय धामकी यानी परमपदको, सूर्य—आदित्य सबको प्रकाशित करनेकी शक्तिवाला होनेपर भी प्रकाशित नहीं कर सकता। वैसे ही शशाङ्क—चन्द्रमा और पावक—अग्नि भी प्रकाशित नहीं कर सकता।
जिस परमधामको यानी वैष्णवपदको पाकर मनुष्य पीछे नहीं लौटते और जिसको सूर्यादि ज्योतियाँ प्रकाशित नहीं कर सकतीं, वह मुझ विष्णुका परमधाम पद है ॥ ६ ॥
पू०—‘जहाँ जाकर फिर नहीं लौटते’ यह बात कही गयी। परंतु सभी गतियाँ, अन्तमें पुनरागमनयुक्त होती हैं और सभी संयोग अन्तमें वियोगवाले होते हैं, यह बात प्रसिद्ध है। फिर यह बात कैसे कही जाती है कि उस धामको प्राप्त हुए पुरुषोंका पुनरागमन नहीं होता?
उ०—उसमें जो कारण है वह सुन—
तात्पर्य पढ़ें
तद् धाम इति व्यवहितेन धाम्ना सम्बन्धः ।
धाम तेजोरूपं पदं न भासयते सूर्य आदित्यः
सर्वावभासनशक्तिमत्त्वे अपि सति। तथा न
शशाङ्कः चन्द्रो न पावको न अग्निः अपि।
यद् धाम वैष्णवं पदं गत्वा प्राप्य न निवर्तन्ते यत् च सूर्यादिः न भासयते तद् धाम पदं परमं मम विष्णोः ॥ ६ ॥
‘यद्गत्वा न निवर्तन्ते’ इति उक्तम्। ननु सर्वा हि गतिः आगत्यन्ता संयोगा विप्रयोगान्ता इति हि प्रसिद्धं कथम् उच्यते तद्धामगतानां नास्ति निवृत्तिः इति।
शृणु तत्र कारणम्—