मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥ ७ ॥
mamaivāṃśo jīvaloke jīvabhūtaḥ sanātanaḥ .
manaḥṣaṣṭhānīndriyāṇi prakṛtisthāni karṣati .. 7 ..
जीवलोक में अर्थात् संसारमें, जो जीवरूप शक्ति, भोक्ता, कर्ता इत्यादि नामोंसे प्रसिद्ध है, वह मुझ परमात्माका ही सनातन अंश है, अर्थात् अंग, भाग, एकदेश जो भी कुछ कहो, एक ही अभिप्राय है।
जैसे जल में प्रतीत होनेवाला सूर्य का अंश—प्रतिबिम्ब, जल रूप निमित्तका नाश होनेपर सूर्यको ही प्राप्त होकर फिर नहीं लौटता, वैसे ही उस परमात्माका यह अंश भी, उस परमात्मा से ही संयुक्त हो जाता है। फिर नहीं लौटता।
अथवा जैसे घट आदि उपाधिसे परिच्छिन्न घटादिका आकाश, आकाशका ही अंश है और वह घट आदि निमित्तके नाश होनेपर, आकाशको ही प्राप्त होकर फिर नहीं लौटता, वैसे ही इसके विषयमें भी समझना चाहिये। सुतरां ‘जहाँ जाकर नहीं लौटते’ यह कहना उचित ही है।
पू०—अवयवरहित परमात्माका अवयव, एकदेश अथवा अंश, कैसे हो सकता है? और यदि उसे अवयवयुक्त मानें, तो उन अवयवोंका विभाग होनेसे परमात्मा के नाशका प्रसङ्ग आ जायगा।
उ०—यह दोष नहीं है; क्योंकि अविद्याकृत उपाधिसे परिच्छिन्न, एकदेश ही अंशकी भाँति माना गया है। यह बात क्षेत्राध्याय में विस्तारपूर्वक दिखलायी गयी है।
वह मेरा अंशरूप माना हुआ जीव, संसारमें कैसे आता है और कैसे शरीर छोड़कर जाता है, सो बतलाते हैं—
(यह जीवात्मा) मन जिनमें छठा है, ऐसी कर्णछिद्रादि अपने-अपने गोलकरूप प्रकृतियोंमें स्थित हुई, श्रोत्रादि इन्द्रियोंको आकर्षित करता है ॥ ७ ॥
किस कालमें (आकर्षित करता है)?
तात्पर्य पढ़ें
मम एव परमात्मनः अंशो भागः अवयव एकदेश इति अनर्थान्तरं जीवलोके जीवानां लोके संसारे जीवभूतो भोक्ता कर्ता इति प्रसिद्ध सनातनः ।
यथा जलसूर्यकः सूर्यांशो जलनिमित्तापाये
सूर्यम् एव गत्वा न निवर्तते तथा अयम् अपि अंशः तेन एव आत्मना सङ्गच्छति एवम् एव । यथा वा घटाद्युपाधिपरिच्छिन्नो घटाद्याकाश आकाशांशः सन् घटादिनिमित्तापाये आकाशं प्राप्य न निवर्तते इति एवम् अत उपपन्नम् उक्तम् ‘यद्गत्वा न निवर्तन्ते’ इति ।
ननु निरवयवस्य परमात्मनः कुतः अवयव एकदेशः अंश इति। सावयवत्वे च विनाश-प्रसङ्गः अवयवविभागात्।
न एष दोषः अविद्याकृतोपाधिपरिच्छिन्न एकदेशः अंश इव कल्पितो यतः । दर्शितः च अयम् अर्थः क्षेत्राध्याये विस्तरशः ।
स च जीवो मदंशत्वेन कल्पितः कथं
संसरति उत्क्रामति च इति उच्यते—
मनःषष्ठानि इन्द्रियाणि श्रोत्रादीनि प्रकृतिस्थानि स्वस्थाने कर्णशष्कुल्यादौ प्रकृतौ स्थितानि कर्षति आकर्षति ॥ ७ ॥
कस्मिन् काले—